हम बचपन में नाना-नानी दादा-दादी के घर में
पुराने,
बोले तो, बेहद पुराने सन्दूक रखे और फ़ोटोज़
टंगे देखते थे। जॉर्ज पंचम का फोटो हो या
रानी एलीज़ाबेथ का। स्वदेशी में नेहरू जी और गांधी जी के फोटो लोकप्रिय थे। एक फोटो
मुझे याद है जिसमें नेहरू जी और केनेडी वाईट हाउस के लाॅन में टहल रहे हैं। ऐसा लग
रहा है जैसे केनेडी उन्हें कुछ इंगित कर दिखा रहे हैं और नेहरू जी ठोड़ी पर हाथ
लगाए आश्चर्य से निहार रहे हैं। आपने अगर सुदर्शन की 'हार की
जीत' कहानी पढ़ी हो तो उसमें ज़िक्र आता है “बाबा ने घोड़ा
दिखाया घमडं से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से” वैसा ही
कुछ आश्चर्य नेहरू जी के चेहरे पर था।
हमारे रेडियो, फ्रिज,
ए.सी. और टी.वी. 30-30 साल
चले। वो भी बिना किसी हील-हुज्जत के। तब सोचो चीजों की कितनी गारंटी होती थी।
दरअसल वो गारंटी चीजों की नहीं थी। वो गारंटी आदमी की थी। उसकी नीयत की थी। उसे
अपनी साख बहुत प्यारी थी, प्रॉफ़िट सेकंडरी था। वारंटी शब्द
ही अब आया है। पहले तो गारंटी ही चला करती थी। चीज़ खराब भी नहीं होती थी। दुकानदार आम कहते थे 'दादा खरीदे पोता बरते'। अब कोई दुकानदार ऐसा नहीं
कहता क्योंकि अब यह फैशनेबल नहीं। अब आदमी पोते के बरतने की दृष्टि से कुछ नहीं
खरीदता। उसकी और पोते की पसंद मिलती - जुलती नहीं है। यहाँ हर दो महीने बाद तो नए
वर्जन का लैपटाॅप और फोन मार्किट में आ जाता है। मुझे याद है जब बैल बॉटम चले थे
तब कोई इंसान अगर ड्रेन पाइप वाली पेंट पहने दिख जाता था तो ऐसा मालूम देता था कि
वह किसी पुरानी सभ्यता से चला आया है।
मेरे फ्रिज और ए.सी. ने मेरा साथ 30 साल तक
निभाया। हमने बहुत सी चीजों का साथ तो महज़ इसलिए छोड़ा कि अब उसके पुर्जे मिलना बंद
हो गए या अब के मकेनिक उसे समझ ही नहीं पाते और हाथ खड़े कर देते हैं। अभी चालीस
साल पहले मैंने अपना ट्रान्जिस्टर की नाॅब को ठीक होने दिया तो बाद में ख्याल आया
कि मैंने रसीद तो ली ही नहीं। करीब एक माह बाद मैं दुकान पर गया तो उसने एक टोकरी
मेरे आगे कर दी इसमें से पहचान कर अपना ट्रान्जिस्टर ले लो। कारण कि इस बीच में
बलवाईयों ने उसकी दुकान पर हमला कर लूटमार की थी। मेरी नज़रों में उस दुकानदार की इज्ज़त
बहुत बढ़ गयी। मैं ये सोच रहा था कि ये कंज्यूमर कोर्ट क्यों बनाने पड़े क्यों कि
कोई तो है जो इस पूरी चेन में अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा। एक और नया जुमला
आजकल चला है। 'इन चीजों की इतनी ही एज होती है'। दो साल चल गया और क्या चाहिए। अब नया मॉडल ले लो। उसमें फलां फीचर भी
है। हमारे यहाँ जब वो वाला फ्रिज था जिस में बर्फ (फ़्राॅस्ट) हफ्ते के हफ्ते
निकालनी पड़ती थी तब कमसेकम चीज़ें कब से फ्रिज में रखी हैं, पता
चलता रहता था और बहुधा खराब होने से पहले बरत ली जाती थी। लेकिन अब 'ऑटोमेटिक डिफराॅस्ट' होने वाले फ्रिज आ गए हैं। अब
चीज़ें सीधे फ्रिज से डस्टबिन में जाती हैं। इस चक्कर में हमने अपने पेट को भी
कमोबेशी डस्टबिन ही बना लिया है। अब रेडियो, घड़ी, ट्रान्जिस्टर, मोबाइल फोन, लैपटाॅप
खराब हो जाये तो मैं इस जुगाड़ में लग जाता हूँ कि इसे कैसे चलाने लायक बनाया जाये।
बच्चों को कानों कान खबर हुए बिना। क्यों कि आज के दौर में चीज़ें ऐसी नहीं बनीं
हैं आजकल के बच्चे भी कम बेसबरे नहीं। वे तुरंत डिक्लेयर कर देते हैं कि
"फेंको इसे! दूसरा नया ले लो"। अब उन्हे कौन समझाये कि हम उस पीढ़ी के
हैं जो हवाई चप्पल की बद्दी (स्ट्रैप) टूट जाने पर ऑलपिन या सेफ़्टी पिन से चला
लिया करते थे। जूते की रिपेयर तब तक कराते रहते थे जब तक हमें या जूते को शर्म ही
न आने लग जाये या मोची हाथ खड़े कर दे। जो भी पहले हो। हम बड़े गर्व से बताते थे ये
मेरे पिताजी की अथवा दादा जी की घड़ी है। आज भी सही टाइम बताती है। सही चल रही है।
वहीं 'ग्रांड सन' का कहना है "ये
लिमिटेड एडिशन घड़ी है। यह वाटर प्रूफ है, यह दिन, तारीख बताती है। आप कितना चले, कितनी कैलोरी बर्न की
और आपका हार्ट रेट भी"। अब उन्हें कौन समझाये हमारे टाइम पर तो बुजुर्ग हमें
देख कर ही हमारे दिल का हाल बता देते थे।
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