Ravi ki duniya

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Sunday, October 18, 2026

निर्मला देवी और कुमकुम

 

वाराणसी (बनारस) में एक तबला उस्ताद वासुदेव नारायण सिंह  रहा करते थे। वे बनारस (वाराणसी) के संगीत जगत में वासुदेव महाराज के नाम से प्रसिद्ध थे। उनकी एक बेटी निर्मला (7 जून 1927) और एक बेटा लक्ष्मण नारायण सिंह थे। जो सिंह लक्ष्मण प्रसाद सिंह एक प्रमुख तबला वादक बने  और दुनिया उन्हें लच्छू महाराज के रूप में जानती है।


                                         


 

पारिवारिक परंपरा के अनुरुप बेटी निर्मला ने संगीत शिक्षा को अपनाया और पटियाला घराने की एक निपुण हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका बनीं। उनका दूसरा नाम दुलारी था। हांलाकि अपनी चाची द्वारा पालने की वजह से उन्हें नाज़िम नाम भी मिला। उन्होंने फिल्मों में अभिनय भी किया और 1942 की शुरुआत में उन्होंने 1940 और 50 के दशक में एक दर्जन से अधिक फिल्में दीं। 15 जून 1996 को उनका निधन हो गया।

 उन्होंने अपनी फिल्मों के  सह-कलाकार, गुलशन सिंह आहूजा से शादी कर ली। वे अपने स्क्रीन नाम अरुण से मशहूर थे। समय के साथ  दंपति के पांच बच्चे हुए। दो बेटे और तीन बेटियां।

                                       


वासुदेव महाराज ने बाद में एक मुस्लिम महिला से भी शादी रचाई उनकी मुस्लिम पत्नी का नाम मुन्नन था।  मुन्नन से वासुदेव महाराज के दो खूबसूरत बेटियाँ हुईं। ज़ैबुन्निसा और राधा। प्रसिद्ध कत्थक नर्तक पंडित शंभू महाराज ने कत्थक नृत्य में जैबुन्निसा को प्रशिक्षित किया। उनकी बड़ी बहन राधा एक अभिनेत्री बन गईं और उन्होंने राधिका नाम से  कुछ फिल्मों में अभिनय किया। मिस्टर एंड मिसेज 55, रात के राही, लाल निशान और शोला जो भड़के।

एक बार विख्यात निर्माता निर्देशक गुरुदत्त की पारखी नज़र जैबुन्निसा पर पड़ी। उन्होंने जैबुन्निसा को अवसर दिया। स्क्रीन नाम कुमकुम से जैबुन्निसा ने 115 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वह एक श्रेष्ठ नर्तकी थीं। रामानंद सागर की फिल्मों का वह  जरूर होतीं थीं। उन्होंने भारत की पहली भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियारी चढ़ाईबो' 1963 में अभिनय किया था। उनकी  अंतिम फिल्म 'एक कुँवारी एक कुँवारा' 1977 थी। फिर वे 1975 में सज्जाद अकबर खान (लखनऊ) शादी कर सऊदी अरब चलीं गईं। 28 जुलाई 2020 को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

                 

                                          


गुलशन सिंह आहूजा ने 1939 से शुरू कर अरुण आहूजा नाम से 40 से अधिक फिल्में दीं। उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म 'सेहरा' के फ्लाॅप होने के बाद उन्हें कार्टर रोड, बान्द्रा स्थित अपना बंगला बेचना पड़ा और 1960 के दशक में वे विरार में आ बसे। माधुरी दीक्षित की पहली फिल्म 1984 में रिलीज हुई फिल्म 'अबोध' में अरुण कुमार ने अपनी आखिरी सहायक भूमिका की थी।  3 जुलाई 1998 को उनका निधन हो गया। उनके अभिनेता बेटे गोविंदा को 'विरार का छोकरा' भी कहा जाता है।                          

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