इस रूखे से जग में
नभ के तल में
मेरे जीवन के मरुस्थल में.
तुम भर लायीं थीं
अपनी अंजुरि में खुशियाँ.
और मैं अपनी
शाश्वत प्यास को
साथ ले मर न सका.
हाँ यह और बात है
ठीक से जी भी तो न सका.
मुझे लगा तुम्हारा ये
अंजुरि भर अमृत कहीं
कम न हो जाए.
ये भी क्यों नहीं मेरी प्यास
की तरह शाश्वत हो जाये.
काश तुम अविरल
झरने सी बहती रहो.
मैं चुप, कुल जग से
बेखबर हो पान करता रहूँ.
जग अज्ञानी गाता रहे
गुण ज्ञान के
मैं तो बस तुम्हारा
गान करता रहूँ .
********
वक्त तुम्हें मुझसे
दूर ले जाएगा
मुझे तुम्हारी नज़रों में
अजनबी बनाएगा.
मगर सच तो यह है
हर गुजरा लम्हा मुझे
तुम्हारे और नज़दीक लाएगा.
मुझे यकीन है
तुम जब भी कभी आओगे
मेरे मरुस्थली जीवन में
वसंत लाओगे.
और यकीन जानो
जब भी याद करोगे
मुझे अपने
इंतज़ार में पाओगे.
****************
गुजर रहा है ज़िंदगी का सफर
इस ख्याल में मेरा.
तुम्हें आज नहीं तो
कल आएगा ख्याल मेरा.
तेरे लब पे होगा
मेरी सुबह का बसेरा.
तेरी ज़ुल्फ़ तले ढँक जाएगा
मेरा हर अंधेरा.
गिनती करा रहा है बार बार
ये जहाँ खामियाँ मेरी.
एक तुम साथ जो होते
ये ही बन जातीं खूबियाँ मेरी.
सच ! मैं जैसा भी हूँ
तुम्हें स्वीकारना होगा.
खुद को बदलने का अर्थ
हारना होगा.
(काव्य संग्रह 'ओस की बूँदें' 1994 से )
Ravi ki duniya
Wednesday, March 17, 2010
Sunday, March 14, 2010
विज्ञापन गोरी के
(हिंदुस्तान में शादी का अर्थ दो जन की शादी नहीं होता, यह दो परिवारों,दो गांवों,की शादी होती है. यह मौका होता है देखने-दिखाने का, रूठने-मनाने का,कर्ज़ लेने देने का. झगड़े-फसाद का,रिश्तेदारी निभाने, बदला लेने का )
कहते हैं जोड़े स्वर्ग से तय होकर आते हैं मगर आजकल अखबारों ने वर-वधू को मिलवाने का काम अपने जिम्मे ले लिया है. अखबारों के सफ़े के सफ़े भरे जाने लगे हैं. साथ ही उन्होने इस बात को भी झुठला दिया है कि सुंदरता देखनेवाले की आँखों में होती है.अख़बार तो कह रहे हैं आओ देखो हमारा हर विज्ञापन सुंदर और प्रेटी वधू ही ऑफर कर रहा है पता नहीं जो लड़कियाँ सुंदर नहीं हैं वे किस अख़बार में विज्ञापन देती हैं. देती भी हैं या नहीं. हो सकता है अब इतने सारे ब्युटि पार्लर के चलते हिन्दुस्तान में कोई असुंदर रह ही न गया हो. आपने कोई विज्ञापन नहीं पढ़ा होगा जिसमें कुरूप लड़के या लड़की का हवाला दिया गया हो. बताया गया हो कि लड़की क्या है पूरी चामुंडा है. सूपर्णखा सी सुंदर है. आओ बेटा आँख बंद करो सिर नबाओ और वरमाला स्वीकार करो.
वैवाहिक विज्ञापनों में एक झूठ धड़ल्ले के साथ बोला जाता है. कोई भी वधू काली नहीं होती सब फेयर होती हैं. जिनकी लड़कियाँ वाकई गोरी-चिट्टी थीं उन्हें इन नकली गोरियों से अपनी स्थिति ख़तरे में जान पड़ी वो फट से अंग्रेजी के विज्ञापन में भी सीधे सीधे गोरी गर्ल लिखने लग गए ताकि आप खातिरजमा रहें कि गोरी, गोरी ही होती है फेयर उसका क्या खा के या कहना चाहिये क्या लगा के मुक़ाबला करेगी.आवश्यकता आविष्कार कि जननी होती है. बाज़ार में तेल,क्रीम,उबटन,मास्क,हर्बल आ गए हैं. सात दिन के अंदर अंदर आपको इतना गोरा कर देने के क्लेम हो गए कि आपकी सखी सहेलियाँ भी आपको पहचान नहीं पायें और पहचान लें तो ईर्ष्या के मारे सिर धुनें 'हाय ये क्या हो गया, कैसे हो गया' ?
लड़का चाहे भौंडा हो या गैंडा हो, सींकिया पहलवान हो या फिर बेरोज़गारी के चलते रोड-इंस्पेक्टरी करता हो,उसके कालेपन को 'कालू राम' नहीं कहते बल्कि पुरुषों ने मिल कर उसे डार्क एंड हेंडसम बना लिया है जैसे जितना ज्यादा काला उतना ही अधिक हेंडसम और ही-मैन होगा.कोई नहीं कहता लड़की डार्क एंड ब्यूटीफूल है. मैं समझता हूँ ये गोरे बनने का बुखार का वाइरस अंग्रेजी दासता के समय से चला आ रहा होगा. वैसे है ये शोध का विषय कि गोरी ही क्यूँ. भारत कि जनसंख्या जिस प्रकार के भू-भाग में बसती है वहाँ तरह तरह के रंग हैं. दरअसल भारत एक रंग-निरपेक्ष देश है. अफ्रीका के रंग भेद की चिंता करने तो हमारे नेता लोग विशेष प्लेन से पूरे यूरोप का चक्कर लगा आते हैं लेकिन अपने देश में जो रंगभेद है उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता. जाये भी क्यूँ ? खुद के फँसने के चान्सेज ज्यादा रहते हैं. इसलिये ऐसे टंटों से दूरी भली.
यह भारतीयों कि ही मनोवृति होगी अन्यथा भला सोचिए कि अफ्रीका वाले गोरी वधू कहाँ से लाएँगे. हमारे सयाने कहते कहते सठिया गए कि चाम नहीं काम प्यारा होता है. ब्युटी तो स्किन डीप होती है. सुंदरता से अधिक महत्वपूर्ण शील-स्वभाव होता है आदि आदि.इस सबके बावजूद शादी लायक होते ही हर लड़का ठान लेता है कि शादी करनी है तो मसाला फिल्म की हीरोइन से या उस से मिलती जुलती से न कि आर्ट फिल्म की नायिका से. वह तो आर्ट फिल्म में ही भली. उस से सहानभूति रखी जा सकती है उसके परिवेश पर अंग्रेजी में सेमिनार आयोजित किए जा सकते हैं. शादी ? और उससे, न बाबा न. उबटन,क्रीम,खीरा,नींबू-संतरे के छिलके आदि न जाने क्या क्या चीजें गोरा बनने की चाह में इस्तेमाल में ली जा रहीं हैं. ये कोसमेटिक सर्जरी वाले पकोड़े सी नाक को क्लिओपेट्रा की नाक बना सकते हैं. आपके गाल में गड्डे डाल सकते हैं (जेब में भी ) आपकी ठोड़ी को काट-छांट कर मोहक बना सकते हैं, आँखों बालों का रंग बादल सकते हैं. मगर आपका रंग अगर काला है तो वे कुछ नहीं कर सकते.
आप भी भला क्या करें. रेगमाल से तो नहीं घिस सकते. ऐसे में आपकी मदद को आते हैं ये विज्ञापन जिसमें आप 'फेयर' लिखकर बात बना सकते हैं. 'डिसेंट मैरिज' का अर्थ अब सब समझने लगे हैं कि मोटी मुर्गी है. सभी वधुएँ स्वीट, लविंग,केयरिंग,प्रेटी और होमली हाती हैं. जैसे मर्द सारे टॉल,हेंडसम के साथ साथ वेल् सेटल्ड और चार अंकों कि आय वाले होते हैं. यह एक हज़ार से लेकर नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे तक कुछ भी हो सकती है.
मेरे एक परिचित से लड़की वालों ने ज़िद की कि आगे की बात बाद में करेंगे पहले बतायें बारात कौन से फाइव स्टार में ठहराना पसंद करेंगे-- अशोका या इंपीरियल ? चार्टर्ड प्लेन करें या स्पेशल ट्रेन से आयेंगे ? खर्चे की फ़िकर न करें सब हमारा होगा, आखिर हमारी इज्ज़त का सवाल है. लड़केवालों को ऐसी बातें सुन सुन कर सन्निपात सा हुआ जाता था. आगा पीछा सोचे बिना मंत्र-मुग्ध हो गए और दौड़े दौड़े गोद भर आए. जब बारात शहर में उतरी तो किसी ने पानी की भी न पूछी और खाना ऐसा था कि बारात सवेरे फ़ूड पोइजनिंग से अस्पताल में दाखिल थी. सबको स्पष्ट तौर पर कट्टे-तमंचों की सहायता से 'समझा' दिया गया था कि चूँ भी की तो सबको दहेज के इल्ज़ाम में अंदर करा देंगे. बाराती अस्पताल से ही छुपते-छुपाते जान बचा कर भागे. किसी ने अपने सामान की रिपोर्ट भी न लिखायी.कहने लगे लड़की वालों को गिफ्ट कर आए हैं.
लड़केवालों के नखरे की बात ही निराली है. विवाह समारोहों में लड़केवाले मील भर दूर से ही पहचाने जाते हैं. उनके हाव-भाव और व्यक्तित्व से लड़केवाले होने का घमंड लगातार टपकता रहता है. हमारे मोहल्ले के एक सज्जन ने बेचारे लडकीवालों को यह कह कर भौंचक्का कर दिया कि 'दुल्हा हाथी पर आएगा इसलिये बारात के साथ साथ हाथी के खाने का इंतज़ाम भी कर रखें. ज्यादा नहीं यही कोई चार मन केले और बीस गट्ठर गन्ने' उनका यह भी कहना था ' मैं तो ऐसी चीजों के सख्त ख़िलाफ़ हूँ मगर लड़के की माँ की ज़िद है पप्पू को हाथी पर बैठा देखने की' आपने गौर किया होगा कि लड़की पर या लडकीवालों पर जितना लड़की लड़के की माँ,बहन,भाभी भारी पड़ती है उतना अन्य कोई पुरुष संबंधी नहीं. निष्कर्ष वही पुराना 'औरत ही औरत की दुश्मन होती है' बहरहाल जब बारात जाने लगी तो हाथी को देख पप्पूजी की घिग्घी बंध गयी. उसने सारी ज़िंदगी तो साइकल की सवारी की थी.पप्पू के पापा फिर भी हाथी को साथ ले गए थे. रौब रहेगा.
बारातियों के ठसके भी लाजवाब होते हैं. गाँव और कस्बों की शादियों में तो बाराती भी दूल्हे से उन्नीस तैयारी नहीं करते. निकटतम काबे के बड़े बाज़ार में अनेक दुकानें तो मात्र बारातियों की ज़रूरत की चीजें ही रखती हैं जैसे रंगीन तेल की छोटी शीशी, खुशबूवाला साबुन (किसी भी कंपनी का) , साबुनदानी, रूमालों का जोड़ा,टोपी,तौलिया,सस्ते से सस्ते इत्र, छोटीवाली क्रीम की शीशी, चटख रंग के मोजे, किसी भी ब्रांड की छोटी टूथपेस्ट और टूथब्रश.
जब से होटल और मैरिज हौल में शादियाँ होने लगी हैं सारा मज़ा ही किरकिरा हो गया है. न पत्तल रही न पांत रही और न ही वो इसरार से खीर-पूड़ी और शर्त बद कर लड्डू खाने-खिलाने वाले रहे. रह गयी है तो बस डायबिटीज़,डाइटिंग और बूफ़े डायनिंग अर्थात कौव्वा भोज.
(व्यंग्य संग्रह 'मिस रिश्वत' 1995 से)
कहते हैं जोड़े स्वर्ग से तय होकर आते हैं मगर आजकल अखबारों ने वर-वधू को मिलवाने का काम अपने जिम्मे ले लिया है. अखबारों के सफ़े के सफ़े भरे जाने लगे हैं. साथ ही उन्होने इस बात को भी झुठला दिया है कि सुंदरता देखनेवाले की आँखों में होती है.अख़बार तो कह रहे हैं आओ देखो हमारा हर विज्ञापन सुंदर और प्रेटी वधू ही ऑफर कर रहा है पता नहीं जो लड़कियाँ सुंदर नहीं हैं वे किस अख़बार में विज्ञापन देती हैं. देती भी हैं या नहीं. हो सकता है अब इतने सारे ब्युटि पार्लर के चलते हिन्दुस्तान में कोई असुंदर रह ही न गया हो. आपने कोई विज्ञापन नहीं पढ़ा होगा जिसमें कुरूप लड़के या लड़की का हवाला दिया गया हो. बताया गया हो कि लड़की क्या है पूरी चामुंडा है. सूपर्णखा सी सुंदर है. आओ बेटा आँख बंद करो सिर नबाओ और वरमाला स्वीकार करो.
वैवाहिक विज्ञापनों में एक झूठ धड़ल्ले के साथ बोला जाता है. कोई भी वधू काली नहीं होती सब फेयर होती हैं. जिनकी लड़कियाँ वाकई गोरी-चिट्टी थीं उन्हें इन नकली गोरियों से अपनी स्थिति ख़तरे में जान पड़ी वो फट से अंग्रेजी के विज्ञापन में भी सीधे सीधे गोरी गर्ल लिखने लग गए ताकि आप खातिरजमा रहें कि गोरी, गोरी ही होती है फेयर उसका क्या खा के या कहना चाहिये क्या लगा के मुक़ाबला करेगी.आवश्यकता आविष्कार कि जननी होती है. बाज़ार में तेल,क्रीम,उबटन,मास्क,हर्बल आ गए हैं. सात दिन के अंदर अंदर आपको इतना गोरा कर देने के क्लेम हो गए कि आपकी सखी सहेलियाँ भी आपको पहचान नहीं पायें और पहचान लें तो ईर्ष्या के मारे सिर धुनें 'हाय ये क्या हो गया, कैसे हो गया' ?
लड़का चाहे भौंडा हो या गैंडा हो, सींकिया पहलवान हो या फिर बेरोज़गारी के चलते रोड-इंस्पेक्टरी करता हो,उसके कालेपन को 'कालू राम' नहीं कहते बल्कि पुरुषों ने मिल कर उसे डार्क एंड हेंडसम बना लिया है जैसे जितना ज्यादा काला उतना ही अधिक हेंडसम और ही-मैन होगा.कोई नहीं कहता लड़की डार्क एंड ब्यूटीफूल है. मैं समझता हूँ ये गोरे बनने का बुखार का वाइरस अंग्रेजी दासता के समय से चला आ रहा होगा. वैसे है ये शोध का विषय कि गोरी ही क्यूँ. भारत कि जनसंख्या जिस प्रकार के भू-भाग में बसती है वहाँ तरह तरह के रंग हैं. दरअसल भारत एक रंग-निरपेक्ष देश है. अफ्रीका के रंग भेद की चिंता करने तो हमारे नेता लोग विशेष प्लेन से पूरे यूरोप का चक्कर लगा आते हैं लेकिन अपने देश में जो रंगभेद है उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता. जाये भी क्यूँ ? खुद के फँसने के चान्सेज ज्यादा रहते हैं. इसलिये ऐसे टंटों से दूरी भली.
यह भारतीयों कि ही मनोवृति होगी अन्यथा भला सोचिए कि अफ्रीका वाले गोरी वधू कहाँ से लाएँगे. हमारे सयाने कहते कहते सठिया गए कि चाम नहीं काम प्यारा होता है. ब्युटी तो स्किन डीप होती है. सुंदरता से अधिक महत्वपूर्ण शील-स्वभाव होता है आदि आदि.इस सबके बावजूद शादी लायक होते ही हर लड़का ठान लेता है कि शादी करनी है तो मसाला फिल्म की हीरोइन से या उस से मिलती जुलती से न कि आर्ट फिल्म की नायिका से. वह तो आर्ट फिल्म में ही भली. उस से सहानभूति रखी जा सकती है उसके परिवेश पर अंग्रेजी में सेमिनार आयोजित किए जा सकते हैं. शादी ? और उससे, न बाबा न. उबटन,क्रीम,खीरा,नींबू-संतरे के छिलके आदि न जाने क्या क्या चीजें गोरा बनने की चाह में इस्तेमाल में ली जा रहीं हैं. ये कोसमेटिक सर्जरी वाले पकोड़े सी नाक को क्लिओपेट्रा की नाक बना सकते हैं. आपके गाल में गड्डे डाल सकते हैं (जेब में भी ) आपकी ठोड़ी को काट-छांट कर मोहक बना सकते हैं, आँखों बालों का रंग बादल सकते हैं. मगर आपका रंग अगर काला है तो वे कुछ नहीं कर सकते.
आप भी भला क्या करें. रेगमाल से तो नहीं घिस सकते. ऐसे में आपकी मदद को आते हैं ये विज्ञापन जिसमें आप 'फेयर' लिखकर बात बना सकते हैं. 'डिसेंट मैरिज' का अर्थ अब सब समझने लगे हैं कि मोटी मुर्गी है. सभी वधुएँ स्वीट, लविंग,केयरिंग,प्रेटी और होमली हाती हैं. जैसे मर्द सारे टॉल,हेंडसम के साथ साथ वेल् सेटल्ड और चार अंकों कि आय वाले होते हैं. यह एक हज़ार से लेकर नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे तक कुछ भी हो सकती है.
मेरे एक परिचित से लड़की वालों ने ज़िद की कि आगे की बात बाद में करेंगे पहले बतायें बारात कौन से फाइव स्टार में ठहराना पसंद करेंगे-- अशोका या इंपीरियल ? चार्टर्ड प्लेन करें या स्पेशल ट्रेन से आयेंगे ? खर्चे की फ़िकर न करें सब हमारा होगा, आखिर हमारी इज्ज़त का सवाल है. लड़केवालों को ऐसी बातें सुन सुन कर सन्निपात सा हुआ जाता था. आगा पीछा सोचे बिना मंत्र-मुग्ध हो गए और दौड़े दौड़े गोद भर आए. जब बारात शहर में उतरी तो किसी ने पानी की भी न पूछी और खाना ऐसा था कि बारात सवेरे फ़ूड पोइजनिंग से अस्पताल में दाखिल थी. सबको स्पष्ट तौर पर कट्टे-तमंचों की सहायता से 'समझा' दिया गया था कि चूँ भी की तो सबको दहेज के इल्ज़ाम में अंदर करा देंगे. बाराती अस्पताल से ही छुपते-छुपाते जान बचा कर भागे. किसी ने अपने सामान की रिपोर्ट भी न लिखायी.कहने लगे लड़की वालों को गिफ्ट कर आए हैं.
लड़केवालों के नखरे की बात ही निराली है. विवाह समारोहों में लड़केवाले मील भर दूर से ही पहचाने जाते हैं. उनके हाव-भाव और व्यक्तित्व से लड़केवाले होने का घमंड लगातार टपकता रहता है. हमारे मोहल्ले के एक सज्जन ने बेचारे लडकीवालों को यह कह कर भौंचक्का कर दिया कि 'दुल्हा हाथी पर आएगा इसलिये बारात के साथ साथ हाथी के खाने का इंतज़ाम भी कर रखें. ज्यादा नहीं यही कोई चार मन केले और बीस गट्ठर गन्ने' उनका यह भी कहना था ' मैं तो ऐसी चीजों के सख्त ख़िलाफ़ हूँ मगर लड़के की माँ की ज़िद है पप्पू को हाथी पर बैठा देखने की' आपने गौर किया होगा कि लड़की पर या लडकीवालों पर जितना लड़की लड़के की माँ,बहन,भाभी भारी पड़ती है उतना अन्य कोई पुरुष संबंधी नहीं. निष्कर्ष वही पुराना 'औरत ही औरत की दुश्मन होती है' बहरहाल जब बारात जाने लगी तो हाथी को देख पप्पूजी की घिग्घी बंध गयी. उसने सारी ज़िंदगी तो साइकल की सवारी की थी.पप्पू के पापा फिर भी हाथी को साथ ले गए थे. रौब रहेगा.
बारातियों के ठसके भी लाजवाब होते हैं. गाँव और कस्बों की शादियों में तो बाराती भी दूल्हे से उन्नीस तैयारी नहीं करते. निकटतम काबे के बड़े बाज़ार में अनेक दुकानें तो मात्र बारातियों की ज़रूरत की चीजें ही रखती हैं जैसे रंगीन तेल की छोटी शीशी, खुशबूवाला साबुन (किसी भी कंपनी का) , साबुनदानी, रूमालों का जोड़ा,टोपी,तौलिया,सस्ते से सस्ते इत्र, छोटीवाली क्रीम की शीशी, चटख रंग के मोजे, किसी भी ब्रांड की छोटी टूथपेस्ट और टूथब्रश.
जब से होटल और मैरिज हौल में शादियाँ होने लगी हैं सारा मज़ा ही किरकिरा हो गया है. न पत्तल रही न पांत रही और न ही वो इसरार से खीर-पूड़ी और शर्त बद कर लड्डू खाने-खिलाने वाले रहे. रह गयी है तो बस डायबिटीज़,डाइटिंग और बूफ़े डायनिंग अर्थात कौव्वा भोज.
(व्यंग्य संग्रह 'मिस रिश्वत' 1995 से)
Friday, March 12, 2010
फंडे मैनेजमेंट के
(इन सब के बिना भारत में ऑफिस / नौकरशाही की कल्पना नहीं की जा सकती)
कहावत है कि पहले आई.सी.एस. के बेटे आई.सी.एस. हुआ करते थे. फिर आई.ए.एस. की संतान आई.ए.एस बनने लगी. मगर जब से इस प्रकार के इम्तिहानों में ‘रूरल बायस’ (ग्रामीण ज़ोर) आया और कम्प्युटर ने आकर लोगों का बंटाधार करना शुरू किया तो चिंता होना स्वाभाविक थी
आई.ए.एस. के बेटे-बेटियों को आई.ए.एस. बनने में ‘जेनुइन’ परेशानी आने लगी. क्या करें ? अब बड़े-बड़े अफसरों की संतान बाबूगिरी तो करने से रहीं. न रिक्शा टेम्पो ही चला सकते हैं. मेरे विचार से वे छोले- भठुरे भी नहीं बेच सकते थे पर पिछले दिनों इतने सारे ‘फास्ट फ़ूड’ रेस्तराओ को देख कर मुझे यह धारणा बदलनी पड़ी.फिर भी जिन्हें डिस्ट्रिक्ट ‘चलाना’ था वो कड़छी ‘चलाते’ अच्छे लगते हैं क्या? ऐसी परिस्थिति में हैसियत के मुताबिक नए हाई टेक रोजगार खोजे जाने लगे. आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है.अतः इसी आवश्यकता की प्रतिपूर्ति के लिए जगह-जगह स्कूल कॉलेज खोले गए जिसमें मेनेजमेंट से लेकर मेनरिज़्म तक पढ़ाई जाने लगी. मेनेजमेंट भी तरह तरह की. साबुन,तेल,अगरबत्ती,सलवार-कमीज़, पापड़, बड़ी आदि बनाने बेचने का काम भी अब मेनेजमेंट एक्सपर्ट करते हैं. वो टाई लगाते हैं और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं.
कहते हैं ब्रिटिश राज को हमारे यहाँ सफल बनाने में हिन्दुस्तानी सिपाहियों और मुंशियों की बहुत बड़ी भूमिका रही है. उसी तरह मल्टीनेशनल और फ़ॉरेन बाँकों के प्रचार-प्रसार में इस तरह के मेनेजरों का काफी योगदान रहा है. वहाँ ऐसे एक्सपर्ट की काफी खपत है. वे उन्हे पदनाम भी बहुत भन्नाट देते हैं. जैसे ग्रुप जनरल मैनेजर, वाइस प्रेसीडेंट, चीफ प्रेसीडेंट, कंट्री हेड आदि. सारे जनरल मैनेजर और डाइरेक्टर ताकते रह जाएँ. ऐसे मैनेजर मील भर दूर से ही पहचाने जा सकते हैं. डिजाइनर शर्ट, डिजाइनर जूते-मोजे, टाई और ब्रीफकेस. वे किंग साइज़ सिगरेट,क्षमा करें , फैग (यथा संभव विदेशी) पीते हैं. यस को याह बोलते हैं. इन मेनेजरों का तो शब्दकोश ही निराला है. इनके साथी और नीचे काम करने वाले सभी चैपी, जौनी ,चार्ली होते हैं.
इसी वर्ग के एक मैनेजेर मेरे परिचित थे. कोई फ़ाइल जाए ‘एप्रूवड एज पर रूल’ (नियमानुसार स्वीकृत) लिख देते थे. उन्हें इस से अधिक मैनेजमेंट आती ही नहीं थी. अब फ़ाइल भेजने वाले सिर धुना करते थे की यह हाँ हुई या ना हुई. कोई पूछने चला जाये तो बस उसकी तो आफत ही आ जाती थी. काटने दौड़ते थे. “यू डोंट नो एनिथिंग” इतनी फटकार लगाते थे कि कोई दुबारा जाने की हिम्मत ही न करे. एक मैनेजर साहब तो भारतीय संस्कृति और यहाँ के पशु-पक्षियों से इस कदर मुतास्सर थे कि मातहत मैनेजर के गुणों की तुलना पशु-पक्षियों से करते थे. यथा मैनेजर को गधे से कुछ सीखना चाहिये (धीरज और मेहनत)मैनेजर को कुत्ते जैसा होना चाहिये (सदैव चौकन्ना और स्वामीभक्त). उनके कमरे में जाने से पहले ही हम शर्त लगाया करते थे कि आज किस जानवर की मुसीबत आनेवाली है. उनका सबसे प्रिय उदाहरण बिलौटे का था – पुरुषार्थ (यदि दूध मलाई खानी है ) और फास्ट मूविंग. जब उनकी बदली हुई तब कहीं जाकर हमारी और जानवरों की रिश्तेदारी ख़त्म हुई. उनकी जगह जो बॉस आए वो पहले कभी प्रोफेसर रहे थे. उनके बारे में मशहूर था कि उन्हे हार्ट प्राब्लम है. बस फिर क्या था जब कभी किसी पर बिगड़ना होता तो पूरे ज़ोर से चिल्लाते और धड़ाम से खुद ही गिर पड़ते. बुरी तरह हाथ पाँव फेंकने लगते. मुँह से झाग निकालने लगते. टोबाटेक सिंह की स्टाइल में इतना कुछ हिन्दी अंग्रेजी में बड़बड़ाते कि कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता था (मंटो की एक मशहूर कहानी का पात्र) अगले के जरूर हाथ पाँव फूल जाते और वह सिर पर पैर रख कर भागता. फिर वो स्वतः ही सामान्य होकर ऐसे कार्य करने लगते जैसे कुछ हुआ ही न हो.
एक मैनेजर हमें ऐसे मिले जो कम्प्युटर के कायल थे. उन दिनों हमें चिट्ठी-पत्री,नोट,स्मरण-पत्र सभी कम्प्युटर से आते थे. उनके व्यवहार में कम्प्युटर की नामावली का बहुत उदार प्रयोग होता था यथा हार्ड कॉपी मिलते ही फीडबैक देना. तुम्हारा डाटा बेस क्या है ? आदि आदि.उनके साथ मीटिंग वाले दिन लोग बोर्ड रूम के हिज्जे (स्पेलिंग) बादल कर बोर रूम कर देते. वो सदैव भूतकाल में रहते थे. “जब मैं फलां कंपनी में था..” और शुरू हो जाते कि कैसे उन्होने तीर मारे,झंडे गाड़े थे. कई कई बार सुन कर हम सब को उनकी कहानियाँ जुबानी याद हो गयीं थीं.अन्य कंपनी के पात्रों से भी हमारा अच्छा ख़ासा ‘परिचय’ हो गया था. बदकिस्मती से एक बार उस कंपनी के एक सज्जन से मुलाक़ात हुई तब पता चला कि उस कंपनी के इतिहास में उनसे अधिक ‘लायक’ मैनेजर आया ही नहीं था व कैसे वे वहाँ से नहीं निकाले जाते तो कंपनी ही डूब जाती. एक कॉन्फ्रेंस में बॉस ने कुछ रकम का टोटल करवाना चाहा तो मैनेजर साहब ने जेबी कैलकुलेटर निकाला और लगे जोड़ने. बॉस के और मैनेजर के टोटल में पाँच सौ का फर्क आ रहा था. बॉस ने लाल लाल आँखें तरेर कर पूछा “हाऊ कम तुम्हारा पाँच सौ लैस आ रहा है” ? तो मैनेजर साहब के पसीने छूट गए, घिग्घी बंध गयी और कोई जवाब तो बना नहीं बोले “सर मेरे कैलकुलेटर की बैटरी वीक है”
आजकल की मैनेजेंट में ट्रेनिंग और सेमिनार आदि का अत्यंत महत्व है. सेमिनार यदि विदेश में हो और कंपनी के खर्चे पर हो तब तो होड़ लग जाती है. सर फुटौव्वल तक कि नौबत आ जाती है. देश में भी इस तरह के सेमिनार पर्यटन कि दृष्टि से अच्छे शहरों में ही आयोजित किए जाते हैं. स्थान तो सदैव फाइव स्टार होटल ही हुआ करते हैं.एक कंपनी में तो मैनेजरों में इसी बात को लेकर काफी रोष था कि अमुक मैनेजरों का सेमिनार तो हिल स्टेशन पर फाइव स्टार में हुआ था, हमारा इसी शहर में और वो भी इस टुच्चे से कॉन्फ्रेंस हाल में क्यों हो रहा है. ऐसे आयोजनों में सेमिनार के विषय से कहीं अधिक भाग लेने वालों के विषय-भोग का ख्याल रखा जाता है.
एक विमान कंपनी में इस ब्रीड के मैनेजरों की बहुतायत थी. वहाँ चालीस विमान प्रतिमाह बनाने का लक्ष्य रखा गया. रिव्यू मीटिंग में देखा की तीन सप्ताह गुजर गए हैं और दस ही विमान बने हैं. कुछ भी कर लें अगले एक सप्ताह में तीस विमान तो बनने से रहे. तब शुरू होती है मैनेजरों की जगलरी (जादूगरी) और सब मिल कर लक्ष्य को ही घटा कर बीस कर लेते ताकि लक्ष्य से कम भी रहे तो ज्यादा कम न लगे. मैंने अनेक बार सुझाव दिया की वे अपने लक्ष्य को क्यों नहीं 15 विमान प्रति वर्ष कर लेते इस से वे लक्ष्य से भी अधिक उत्पादन का श्रेय पा सकते हैं
यह सुझाव तकनीकी कारणों से कभी स्वीकार्य ना हो सका कारण की उनकी कर्मचारी संख्या व प्लांट क्षमता तो सौ विमान प्रति वर्ष उत्पादन की थी.
बात मैनेजरों की हो रही थी. ऐसे मैनेजर मिस्टर नो आल (सर्वज्ञाता) होते हैं होने का दम तो भरते ही हैं. गो गैटर व लाइव वायर होते हैं. थोड़ी उम्र होते ही या चार कंपनी बदलने के बाद मैनेजमेंट के पितामह की तरह बात करते हैं.विदेशी उदाहरणों और सिस्टम पर दिलोजान से निछावर होते हैं. ‘प्रकाश व्यवस्था का उत्पादन पर प्रभाव’ अथवा ‘तरकारी पकाने का फ्लो चार्ट’ दोनों पर समान अधिकार से किताब लिख सकते हैं.उनका बस चले तो घर में झाड़-बुहार का काम भी पर्ट सी.पी.एम. के माध्यम से करें.
अछे मैनेजर, अछे अभिनेता की तरह पैदायशी होता हैं. उसी तरह खराब मैनेजर भी पैदायशी होते हैं. वे कितनी ही मैनेजमेंट की किताबें पढ़ लें, सेमिनार में भाग ले लें या तरक्की पा जाएँ रहते बौड़म ही हैं. इन किसम किसम के मैनेजरों के जो टॉप टेन फंडे जाने हैं आप भी नोट कर लें क्या पता कब आपको भी मैनेजरी संभालनी पड़ जाये.
फंडा नंबर 1.
मातहत हमेशा गलत होता है. यह पुरानी अवधारणा है कि बॉस हमेशा सही होता है. दोनों के सूक्ष्म अन्तर को पहचानें.
फंडा नंबर 2.
विनम्रता त्यागें. विनम्रता कमजोरी की निशानी है .
फंडा नंबर 3.
एक दो ऐसे तेज अंतरंग सहायक रखें जो आपको सरल भाषा और संदेश में प्रोब्लम/नियम-कायदे समझा सकें.
फंडा नंबर 4.
फ़ाइलें जल्दी न निपटाएं इस से ऐसा लगेगा कि आप बिना पढ़े ही निपटा देते हैं या फिर आप पर और कोई कार्य ही नहीं है
फंडा नंबर 5.
कभी किसी को टेक अप करना ही पड़े तो निचले से निचले कर्मचारी को पकड़ें.
फंडा नंबर 6.
जाँच समिति कि रिपोर्ट क्या होगी यह तय करने के बाद ही जाँच समिति के गठन कि घोषणा करें.
फंडा नंबर 7.
यदि आपको चर्चा पल्ले न पड़ रही हो तो विषय बदलें. यथा बात अगर सहारा रेगिस्तान की हो रही हो तो आप अंटार्कटिका की बात करने लगें.
फंडा नंबर 8.
वर्मा, शर्मा, अस्थाना, कोहली, सिंह, पिल्लई और प्रसाद को आवश्यकतानुसार उठाते-बैठाते रहें. हो सके तो उन्हें आपस में भिड़वाते रहें (बंदर,बिल्ली और रोटी की कहानी याद करें)
फंडा नंबर 9.
समझ ना आए, टालना हो अथवा इशू को किल करना हो तो निम्नलिखित का सहारा लें :
1. कृपया चर्चा करें
2. कृपया नियम लिंक करें
3. कृपया प्रेक्टिस बतायें
4. कृपया मीटिंग बुलाएँ
फंडा नंबर 10.
जब बात कैसे भी न संभले तो राष्ट्र,राष्ट्रीय चरित्र और मॉरल की बातें करनी चाहिये. ऐसी बातों से सभी की सिट्टी पिट्टी गुम हो जायेगी और सब निरुत्तर हो चुप्पी साध लेंगे.
अपने ये टॉप टेन फंडे क्लियर रखें तो आपको हमेशा तरक्की की लाइन क्लियर मिलती जायेगी
(व्यंग्य संग्रह ‘मिस रिश्वत’ 1995 से )
Thursday, March 11, 2010
पार्टी,प्लॉट और प्रॉपर्टी डीलर
(प्रॉपर्टी डीलरों के काले सफ़ेद पराक्रम के किस्से अनगिनत हैं... ये ही असली भूमि पुत्र हैं व भूमि और आपके बीच की कड़ी हैं, मुझे तो लगता है कि आदम और ईव से 'ईडन-गार्डन' खाली करवाने में इनकी भूमिका की अगर सूक्ष्म जाँच की जाए तो किसी न किसी प्रॉपर्टी डीलर का हाथ निकलेगा.)
एक कहावत है कि मूर्ख लोग मकान बनाते हैं और बुद्धिमान उसमें रहते हैं. हमारे यहाँ एक मशहूर शेर है :
कटी उम्र होटलों में
मरे अस्पताल जाकर
अब कोयल को ही लें. वो आर्टिस्ट है. उसे कहाँ यह टाइम कि घर बनाये. भाई या तो संगीत की सेवा करा लीजिये या घोंसले की फजीहत. घर कौवे बनाते हैं सो बना रहे हैं. मेरी इन सब दलीलों का मेरी अन्य बातों की तरह हे मेरी पत्नी पर कोई असर नहीं पड़ता. वह किंचित भी प्रभावित नहीं हो पाती और ज़िद किए रही कि दुनिया मकान बना रही है अतः हमें भी मकान बनाना चाहिए. अब मकान कोई घोंसला तो है नहीं कि नज़दीकी नीम के पेड़ पर जा बैठे. इसके लिए चाहिये एक अदद प्लॉट या फिर ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी कि सदस्यता. चारों तरफ हाथ-पाँव मारने शुरू किए. यह मुहावरा ठीक नहीं है. दरअसल इस प्रक्रिया में हम खुद ही हाथ पाँव में मार खाते रहे. एक ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी तो डूब गयी. उसके अवैतनिक सचिव सारा पैसे लेकर अपनी सचिव के साथ सिंगापुर भाग गए.दूसरी सोसाइटी में बात बात पर इतनी धड़ेबाजी थी कि पता ही नहीं लगता था कि मकान बनेंगे या नहीं,बनेंगे तो कहाँ बनेंगे और कब बनेंगे. धीरे धीरे सब समझदार लोगों ने पैसे निकाल लिए. अंततः यह तय पाया गया कि दिल्ली में अब न तो ज़मीन बची है और न ऑक्सिजन तो क्यों न दिल्ली से थोड़ी दूर हट कर प्लॉट खरीदा जाए. बस फिर क्या था. चारों तरफ खबर भिजवा दी गयी. रविवार कि सुबह सुबह अख़बार ले कर विज्ञापनों पर निशान लगाये जाते. विज्ञापनों को देख कर लगता था कि पूरी दिल्ली बिकाऊ है, शायद झूठ भी नहीं. हम लोग रविवार को निकल जाते. कभी महरौली, कभी छतरपुर, कभी नोएडा, कभी नरेला, कभी गाजियाबाद, कभी फरीदाबाद तो कभी गुड़गाँव.
इस दौरान मेरा भूगोल का ज्ञान इतना विस्तृत हो गया कि मैं खुद हैरान था. आप कोई सा विहार बोलो मैं फौरन बता सकता था कि वह कहाँ है. कनाट प्लेस. आई.टी.ओ. या इन्दिरा गांधी एयरपोर्ट से कितने किलोमीटर है. अब मैं जानता था कि दिल्ली में तीन तीन आनंद विहार हैं. किसी नगर के पास बनने वाली कॉलोनी का नाम उस नगर के प्रथम नाम के बाद विहार लगा देने से बनता है, जैसे तिलक नगर के पास है तो तिलक विहार. मयूर विहार के आसपास जितनी भी नयी कालोनियाँ बनेंगी सब मयूर विहार फ़ेज तीन,चार, छ्ह आठ के नाम से जानी जाएँगी.सोसाइटी का नाम जितना साहित्यिक या लुभावना होगा वह शहर से उतनी ही दूर और गंदे इलाक़े में होगी. मुझे पता लगा कि सैनिक विहार में सैनिक नहीं रहते. मुझे पता चला कि अलकनंदा और नर्मदा विहार में पानी की खूब किल्लत है और विद्युत विहार में इतनी बिजली जाती है कि सबके घर में जनरेटर तथा इनवर्टर लगे हुए हैं. पार्टी,प्लॉट और प्रॉपर्टी डीलर के त्रिकोण में प्रॉपर्टी डीलर एक महत्वपूर्ण कोण है. उसकी भाषा, कोड वर्ड अलग किस्म के होते हैं. वो मोबाइल फोन पर बात करते हैं. शाम होते ही उनका जबाड़ा हिलाने लगता है. नहीं समझे. सूरज अस्त, मजदूर मस्त. अर्थात आग को पी जाते हैं पानी करके. हरियाणा में प्रॉपर्टी डीलर परेशान क्यूँ,प्रॉपर्टी के दाम गिरे क्यूँ ? शराब जो न थी. प्रॉपर्टी डीलर से मैं जब भी मिलने गया वो मुझे मक्खी मारते तन्हा तन्हा मिले. लेकिन पार्टी को देख कर उनके चेहरे पर रौनक आ जाती है. फौरन आपसे आपका बजट पूछ कर आपको शीशे में उतारने की हरचंद कोशिश शुरू. " ओ जी ! पिलौट ही पिलौट हैं, टू साइड ओपन, थ्री साइड ओपन, मीठा पानी, सन फेसिंग, सामने 24 फीट की रोड. मार्किट, स्कूल, मेन रोड" सब उन्हें रटा रहता है. बताते जाते हैं और आपके चेहरे के भाव पढ़ते जाते हैं. एक प्रॉपर्टी डीलर सज्जन मुझे गाड़ी में बैठा कर शहर से इतनी दूर पिलौट दिखाने ले गए कि मैं दिल ही दिल में डर रहा था कि कहीं मुझे किडनेप तो नहीं कर रहे. भगवान से सारे रास्ते दुआ माँगता रहा. वो जो भी दिखा रहे थे मुझे कुछ नहीं दीख रहा था. मैं तो जल्द से जल्द उनके चंगुल से बाहर निकलना चाहता था. वो अपनी समझ से मेरे से बड़े प्रेम से पेश आ रहे थे लेकिन वो जितना मीठा बोल रहे थे मैं उतना ही अधिक घबरा रहा था.
एक बात बताइये ये प्रॉपर्टी डीलर सुकोमल,सहृदय और सामान्य कद काठी के क्यों नहीं होते हैं. क्यों ये फिल्मों के माफिया जैसे होते हैं. क्यों ये इतने हट्टे-कट्टे और पहलवान किस्म के होते हैं "या तो पिलौट खरीद नहीं तो अभी करते हैं चाकू आर-पार"
एक प्लॉट मुझे ऐसा दिखाया गया जो की बाद में पता चला मेरे जैसे 8-10 लोगों को दिखाया जा चुका था. 4-5 लोगों से उसका बयाना लेकर प्रॉपर्टी डीलर ये जा वो जा. मुझे अब ज्ञात हुआ कि अपराध वाले अपने प्लान को प्लॉट क्यों कहते हैं. ये प्रॉपर्टी डीलर बड़े ही स्मार्ट होते हैं. एक प्लॉट कितनों को ही बेच सकते हैं. ये चाहें तो ताजमहल भी बेच दें.सुनसान रेगिस्तान को भी ऐसे प्रोजेक्ट करते हैं जैसे 'स्वर्गधाम' आपके सपनों का घर,हरियाली ही हरियाली, लिफ्ट स्कूल, कॉलेज स्विमिंग पूल, शॉपिंग सेंटर, फुल सेक्युर्टी, कनाट प्लेस से केवल 35 मिनट की ड्राइव आदि आदि.बाद में पता चलता है कि हरियाली के लिए उन्होने पौधे लगा दिये हैं. जब वे बड़े हो जायेंगे तो नेचुरली हरियाली हो जाएगी. स्विमिंग पूल के नाम पर एक बंबा है. शॉपिंग सेंटर के नाम पर प्रॉपर्टी डीलरों की ही दो दुकाने हैं.सेक्युर्टी इतनी कि दिन-दहाड़े मार जायें तो पता भी तीन दिन बाद चले वह भी बदबू से. कनाट प्लेस के कौन से कोने से नापते हैं कौन सी गाड़ी ड्राइव कर रहे हैं और किस रफ़्तार से कौन से रूट से जायेंगे. मैंने तो यह पाया है कि 1 घंट 35 मिनट से भी ज्यादा वक्त लगता है. वे कह सकते हैं कि ट्रेफिक जाम और रेड लाइट बचाते-घटाते हुए 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से ड्राइव करनी है. मैं समझ गया कि प्रॉपर्टी डीलर ने ठीक ही स्वर्गधाम नाम रखा है वे आपके लिए स्वर्ग पृथ्वी पर ही उतार लाये हैं. किसी भी शहर के आवासीय,व्यापारिक,आर्थिक व राजनीतिक विकास में प्रॉपर्टी डीलर्स का बहुत योगदान है. वे इंच इंच ज़मीन महंगे दाम बेच सकते हैं. वे कोलोनियाँ की कोलोनियाँ बसाते हैं. उन्हें अनाधिकृत घोषित कराते हैं.उनमें आग लगवाते हैं फिर उन्हें अधिकृत(रेगुलराइज़) कराते हैं. इसे कहते हैं झूम हाउसिंग. सभी झूम रहे हैं. प्रॉपर्टी डीलर,नेताजी,बिजली-पानी वाले, कार्पोरेशन के कर्मचारी. वे प्रतिकूल कर्मचारियों का ट्रांसफर चुटकी बजाते करा सकते हैं. सरकार की पॉलिसियां निर्धारित कराते हैं. आपके काले धन को सफ़ेद करा सकते हैं. जंगल में मंगल.बुध,वीर मना सकते हैं. वो बता सकते हैं कि दो मंज़िल की चार मंज़िलें कैसे बनाई जाती हैं. सड़क कैसे घेरी जाती है आदि आदि.
प्रॉपर्टी डीलर के बिना विकास की कल्पना करना संभव नहीं है.रेगिस्तान को चमन बनाने और चमन को जंगल बनाने का श्रेय उनको जाता है.
(व्यंग्य संग्रह 'तिहाड़ क्लब' 1999 से )
एक कहावत है कि मूर्ख लोग मकान बनाते हैं और बुद्धिमान उसमें रहते हैं. हमारे यहाँ एक मशहूर शेर है :
कटी उम्र होटलों में
मरे अस्पताल जाकर
अब कोयल को ही लें. वो आर्टिस्ट है. उसे कहाँ यह टाइम कि घर बनाये. भाई या तो संगीत की सेवा करा लीजिये या घोंसले की फजीहत. घर कौवे बनाते हैं सो बना रहे हैं. मेरी इन सब दलीलों का मेरी अन्य बातों की तरह हे मेरी पत्नी पर कोई असर नहीं पड़ता. वह किंचित भी प्रभावित नहीं हो पाती और ज़िद किए रही कि दुनिया मकान बना रही है अतः हमें भी मकान बनाना चाहिए. अब मकान कोई घोंसला तो है नहीं कि नज़दीकी नीम के पेड़ पर जा बैठे. इसके लिए चाहिये एक अदद प्लॉट या फिर ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी कि सदस्यता. चारों तरफ हाथ-पाँव मारने शुरू किए. यह मुहावरा ठीक नहीं है. दरअसल इस प्रक्रिया में हम खुद ही हाथ पाँव में मार खाते रहे. एक ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी तो डूब गयी. उसके अवैतनिक सचिव सारा पैसे लेकर अपनी सचिव के साथ सिंगापुर भाग गए.दूसरी सोसाइटी में बात बात पर इतनी धड़ेबाजी थी कि पता ही नहीं लगता था कि मकान बनेंगे या नहीं,बनेंगे तो कहाँ बनेंगे और कब बनेंगे. धीरे धीरे सब समझदार लोगों ने पैसे निकाल लिए. अंततः यह तय पाया गया कि दिल्ली में अब न तो ज़मीन बची है और न ऑक्सिजन तो क्यों न दिल्ली से थोड़ी दूर हट कर प्लॉट खरीदा जाए. बस फिर क्या था. चारों तरफ खबर भिजवा दी गयी. रविवार कि सुबह सुबह अख़बार ले कर विज्ञापनों पर निशान लगाये जाते. विज्ञापनों को देख कर लगता था कि पूरी दिल्ली बिकाऊ है, शायद झूठ भी नहीं. हम लोग रविवार को निकल जाते. कभी महरौली, कभी छतरपुर, कभी नोएडा, कभी नरेला, कभी गाजियाबाद, कभी फरीदाबाद तो कभी गुड़गाँव.
इस दौरान मेरा भूगोल का ज्ञान इतना विस्तृत हो गया कि मैं खुद हैरान था. आप कोई सा विहार बोलो मैं फौरन बता सकता था कि वह कहाँ है. कनाट प्लेस. आई.टी.ओ. या इन्दिरा गांधी एयरपोर्ट से कितने किलोमीटर है. अब मैं जानता था कि दिल्ली में तीन तीन आनंद विहार हैं. किसी नगर के पास बनने वाली कॉलोनी का नाम उस नगर के प्रथम नाम के बाद विहार लगा देने से बनता है, जैसे तिलक नगर के पास है तो तिलक विहार. मयूर विहार के आसपास जितनी भी नयी कालोनियाँ बनेंगी सब मयूर विहार फ़ेज तीन,चार, छ्ह आठ के नाम से जानी जाएँगी.सोसाइटी का नाम जितना साहित्यिक या लुभावना होगा वह शहर से उतनी ही दूर और गंदे इलाक़े में होगी. मुझे पता लगा कि सैनिक विहार में सैनिक नहीं रहते. मुझे पता चला कि अलकनंदा और नर्मदा विहार में पानी की खूब किल्लत है और विद्युत विहार में इतनी बिजली जाती है कि सबके घर में जनरेटर तथा इनवर्टर लगे हुए हैं. पार्टी,प्लॉट और प्रॉपर्टी डीलर के त्रिकोण में प्रॉपर्टी डीलर एक महत्वपूर्ण कोण है. उसकी भाषा, कोड वर्ड अलग किस्म के होते हैं. वो मोबाइल फोन पर बात करते हैं. शाम होते ही उनका जबाड़ा हिलाने लगता है. नहीं समझे. सूरज अस्त, मजदूर मस्त. अर्थात आग को पी जाते हैं पानी करके. हरियाणा में प्रॉपर्टी डीलर परेशान क्यूँ,प्रॉपर्टी के दाम गिरे क्यूँ ? शराब जो न थी. प्रॉपर्टी डीलर से मैं जब भी मिलने गया वो मुझे मक्खी मारते तन्हा तन्हा मिले. लेकिन पार्टी को देख कर उनके चेहरे पर रौनक आ जाती है. फौरन आपसे आपका बजट पूछ कर आपको शीशे में उतारने की हरचंद कोशिश शुरू. " ओ जी ! पिलौट ही पिलौट हैं, टू साइड ओपन, थ्री साइड ओपन, मीठा पानी, सन फेसिंग, सामने 24 फीट की रोड. मार्किट, स्कूल, मेन रोड" सब उन्हें रटा रहता है. बताते जाते हैं और आपके चेहरे के भाव पढ़ते जाते हैं. एक प्रॉपर्टी डीलर सज्जन मुझे गाड़ी में बैठा कर शहर से इतनी दूर पिलौट दिखाने ले गए कि मैं दिल ही दिल में डर रहा था कि कहीं मुझे किडनेप तो नहीं कर रहे. भगवान से सारे रास्ते दुआ माँगता रहा. वो जो भी दिखा रहे थे मुझे कुछ नहीं दीख रहा था. मैं तो जल्द से जल्द उनके चंगुल से बाहर निकलना चाहता था. वो अपनी समझ से मेरे से बड़े प्रेम से पेश आ रहे थे लेकिन वो जितना मीठा बोल रहे थे मैं उतना ही अधिक घबरा रहा था.
एक बात बताइये ये प्रॉपर्टी डीलर सुकोमल,सहृदय और सामान्य कद काठी के क्यों नहीं होते हैं. क्यों ये फिल्मों के माफिया जैसे होते हैं. क्यों ये इतने हट्टे-कट्टे और पहलवान किस्म के होते हैं "या तो पिलौट खरीद नहीं तो अभी करते हैं चाकू आर-पार"
एक प्लॉट मुझे ऐसा दिखाया गया जो की बाद में पता चला मेरे जैसे 8-10 लोगों को दिखाया जा चुका था. 4-5 लोगों से उसका बयाना लेकर प्रॉपर्टी डीलर ये जा वो जा. मुझे अब ज्ञात हुआ कि अपराध वाले अपने प्लान को प्लॉट क्यों कहते हैं. ये प्रॉपर्टी डीलर बड़े ही स्मार्ट होते हैं. एक प्लॉट कितनों को ही बेच सकते हैं. ये चाहें तो ताजमहल भी बेच दें.सुनसान रेगिस्तान को भी ऐसे प्रोजेक्ट करते हैं जैसे 'स्वर्गधाम' आपके सपनों का घर,हरियाली ही हरियाली, लिफ्ट स्कूल, कॉलेज स्विमिंग पूल, शॉपिंग सेंटर, फुल सेक्युर्टी, कनाट प्लेस से केवल 35 मिनट की ड्राइव आदि आदि.बाद में पता चलता है कि हरियाली के लिए उन्होने पौधे लगा दिये हैं. जब वे बड़े हो जायेंगे तो नेचुरली हरियाली हो जाएगी. स्विमिंग पूल के नाम पर एक बंबा है. शॉपिंग सेंटर के नाम पर प्रॉपर्टी डीलरों की ही दो दुकाने हैं.सेक्युर्टी इतनी कि दिन-दहाड़े मार जायें तो पता भी तीन दिन बाद चले वह भी बदबू से. कनाट प्लेस के कौन से कोने से नापते हैं कौन सी गाड़ी ड्राइव कर रहे हैं और किस रफ़्तार से कौन से रूट से जायेंगे. मैंने तो यह पाया है कि 1 घंट 35 मिनट से भी ज्यादा वक्त लगता है. वे कह सकते हैं कि ट्रेफिक जाम और रेड लाइट बचाते-घटाते हुए 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से ड्राइव करनी है. मैं समझ गया कि प्रॉपर्टी डीलर ने ठीक ही स्वर्गधाम नाम रखा है वे आपके लिए स्वर्ग पृथ्वी पर ही उतार लाये हैं. किसी भी शहर के आवासीय,व्यापारिक,आर्थिक व राजनीतिक विकास में प्रॉपर्टी डीलर्स का बहुत योगदान है. वे इंच इंच ज़मीन महंगे दाम बेच सकते हैं. वे कोलोनियाँ की कोलोनियाँ बसाते हैं. उन्हें अनाधिकृत घोषित कराते हैं.उनमें आग लगवाते हैं फिर उन्हें अधिकृत(रेगुलराइज़) कराते हैं. इसे कहते हैं झूम हाउसिंग. सभी झूम रहे हैं. प्रॉपर्टी डीलर,नेताजी,बिजली-पानी वाले, कार्पोरेशन के कर्मचारी. वे प्रतिकूल कर्मचारियों का ट्रांसफर चुटकी बजाते करा सकते हैं. सरकार की पॉलिसियां निर्धारित कराते हैं. आपके काले धन को सफ़ेद करा सकते हैं. जंगल में मंगल.बुध,वीर मना सकते हैं. वो बता सकते हैं कि दो मंज़िल की चार मंज़िलें कैसे बनाई जाती हैं. सड़क कैसे घेरी जाती है आदि आदि.
प्रॉपर्टी डीलर के बिना विकास की कल्पना करना संभव नहीं है.रेगिस्तान को चमन बनाने और चमन को जंगल बनाने का श्रेय उनको जाता है.
(व्यंग्य संग्रह 'तिहाड़ क्लब' 1999 से )
चाँद की अनछुई किरण हो
छाई हो मेरे
दिल-ऐ-आसमां पर
बदली की तरह .
पाता हूँ मैं अपने को
हरदम तेरे ख्याल में
चिंताओं में घिरे एक
मुफलिस की तरह .
तुम मेरे दिल में
आये सूखे गाँव में
आई पहली
बारिश की तरह .
खतरे में ही रही
ताउम्र मेरी ख़ुशी
जवान बेवा की
आबरू की तरह .
वक़्त तुम्हें मुझसे
दूर ले जायेगा
मुझे तुम्हारी नज़रों में
अजनबी बनाएगा
मगर सच तो यह है
हर गुजरा लम्हा मुझे
तुम्हारे और नज़दीक लायेगा
मुझे यकीं है
तुम जब भी कभी आओगे
मेरे मरुस्थली जीवन में
बसंत लाओगे
और यकीं जानो
जब भी याद करोगे
मुझे अपने
इंतज़ार में पाओगे
छाई हो मेरे
दिल-ऐ-आसमां पर
बदली की तरह .
पाता हूँ मैं अपने को
हरदम तेरे ख्याल में
चिंताओं में घिरे एक
मुफलिस की तरह .
तुम मेरे दिल में
आये सूखे गाँव में
आई पहली
बारिश की तरह .
खतरे में ही रही
ताउम्र मेरी ख़ुशी
जवान बेवा की
आबरू की तरह .
वक़्त तुम्हें मुझसे
दूर ले जायेगा
मुझे तुम्हारी नज़रों में
अजनबी बनाएगा
मगर सच तो यह है
हर गुजरा लम्हा मुझे
तुम्हारे और नज़दीक लायेगा
मुझे यकीं है
तुम जब भी कभी आओगे
मेरे मरुस्थली जीवन में
बसंत लाओगे
और यकीं जानो
जब भी याद करोगे
मुझे अपने
इंतज़ार में पाओगे
Wednesday, March 10, 2010
मेरा आज का शेर
मेरे हिस्से में तो उनकी
बेरुखी भी न आई
खुशकिस्मत हैं वो
जिनकी मुहब्बत को ठुकरा दिया तूने
एक आंसू हमारा था, जो आँख से संभला नहीं
एक आंसू तुम्हारा था, जो आँख से निकला नहीं
डाल दी है तोहमत, मैंने मुक़द्दर की पेशानी पे
हकीकत ये है, मुझे तुमसे कोई गिला नहीं
Monday, March 8, 2010
ख़ुदा ये दिन भी
दिखाए मुझको
मैं रूठा रहूँ
वो मनाये मुझको .
इतना आसां कहाँ
हुनर बदले का
हसरत ही रह गयी
मेरी तरह वो सताए मुझको.
सब कुछ तो कहा
बाकी क्या रहा
अरमाँ अगर है तो
आज वो भी सुनाये मुझको
बस एक तेरी चाहत में
उम्र भर गाते रहे
मैं क्या करूँ
दुनिया ने जो हार पहनाये मुझको.
सुना है मेरा नाम
ना लेने का अहद उठाया है
ये कैसी कसम है शाम-ओ-सहर
वो गुनगुनाये मुझको
दिल के खेल में सनम
माहिर हो चले
ग़ैर की महफ़िल में
बेवफा बताये मुझको
ऐ ख़ुदा दिल के हाथों
इस क़दर मजबूर कर दे
भले बात ना करे
इक बार तो बुलाये मुझको
मुझमें खामियां हज़ार
मुझे कब इनकार
काश वो मिटा के
फिर से बनाए मुझको
दिखाए मुझको
मैं रूठा रहूँ
वो मनाये मुझको .
इतना आसां कहाँ
हुनर बदले का
हसरत ही रह गयी
मेरी तरह वो सताए मुझको.
सब कुछ तो कहा
बाकी क्या रहा
अरमाँ अगर है तो
आज वो भी सुनाये मुझको
बस एक तेरी चाहत में
उम्र भर गाते रहे
मैं क्या करूँ
दुनिया ने जो हार पहनाये मुझको.
सुना है मेरा नाम
ना लेने का अहद उठाया है
ये कैसी कसम है शाम-ओ-सहर
वो गुनगुनाये मुझको
दिल के खेल में सनम
माहिर हो चले
ग़ैर की महफ़िल में
बेवफा बताये मुझको
ऐ ख़ुदा दिल के हाथों
इस क़दर मजबूर कर दे
भले बात ना करे
इक बार तो बुलाये मुझको
मुझमें खामियां हज़ार
मुझे कब इनकार
काश वो मिटा के
फिर से बनाए मुझको
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