Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Friday, April 13, 2012

HUMOUR--- SHE KNOWS EVERYTHING

                                                                       





            It is not only Neetu Singh who proclaims ‘I know everything’.  I know one more lady who goes around repeating her threat that she knows everything.  She reminds me and my kids almost on hourly basis that she knows everything.  You are right … she is my beloved wife.  The fault dear Brothers ! is not in our stars but in ourselves that we are married.  She is one person, who has made me realize like no other Guru of morning TV channels that humans especially husband-type-humans are born imperfect and die imperfect, however, hard they may strive to achieve perfection.  She effortlessly goes in and out of the role of a sleuth putting best of  Mossad men have downcast eyes.  She can make a thriller out of, as mundane an event, as my business lunch out.  “I will not need lunch box today” is enough to wake up the dormant Sherlock Holmes in her. Why?  Where..? Who…? And I can visualize the third degree interrogation.  Finally, hysterical and, at times, not so hysterical reaction follows… should have told last evening … last night… today morning and so on.  Next time if I am found repeating this ‘goof up’ the cruelest penalty awaits me.  She is such a ferocious watcher and commentator of TV serials that she can get selected as the critic of TV shows without having to apply for it.  At times, I am convinced; she would have been as fabulous a TV serial maker as home maker.
            She goes to bed… rather comes to bed only after all the serials of the day have been aired and the repeat telecast for the other hemisphere begins.  She has this peculiar habit of putting her bag of saris/dresses, she considers precious/chosen one, in my cupboard.  I just fail to understand why she does so but she has bullied her way in grabbing tenancy rights in my almirah.  Often, I feel, it is poor me who is a tenant and she is the one who is the Lord of the cupboard. 
            There is one more aspect I want to share:  I am fully convinced that she indeed knows everything in advance through some ‘divine intervention’.  She comes to know when I would be visiting the wash room.  She is already bang there like a land mafia. This is what I call, not illegal but ill time occupation.  I am baffled and fail to understand how she can read my err… mind …every time? I am convinced she is not doing so to tease me.  It is much deeper than that.  The cynics may call it made for each other or whatever. 
            If she were the judge of a ‘worst dressed husband’ pageant, she would handover the crown to me, even if she has to fight for this with rest of the panel.   She hates my wearing cotton track suit.  She insists I wore the branded stretch Lon track suit gifted to me by my mother-in-law.  Also the logo of the brand should be visible and not be covered by some “stupid” oversized tee shirt… yes all this! Notwithstanding the humidity of Mumbai. 
            My wife has a serious grudge against the ceiling fan manufacturers.  Why all the fan regulators have 6 as the maximum notch.  She likes her air-conditioner at ‘High’ and ceiling fan at optimum 6.  She feels the world has progressed so much but these ‘pankhawalas’ are stuck at 6 since the times Philip Diehl invented the fan. It should have speed variations going up to 10 if not 16.  So till then! she is just about tolerating all fans in our house running at measly 6.
            I have enough material to write a fat book on my not so fat dear wife of almost 30 years standing. She is a gourmet’s delight. She loves and enjoys cooking. More often than not we are the handy guinea pigs available for all her culinary experiments. We are happy about it and look forward to her newer inventions. She can easily give run for money to best of the chefs in the city. She is intricately meticulous and definitely has great eye for details. I usually forget but she remembers not only what she wore but what I wore when we last visited Khannas, Sharmas or Vermas. She keeps relations warm with all my relatives both near and distant ones. Left to me, I would have long turned indifferent towards them. So I would give her 100 out of 100 on this count. She is an excellent mind reader of people we come across. Her assessment of people has seldom gone wrong. I am amazed how without studying psychology in her curriculum, she knows so much of human behavior. Similarly, she is a strategic diplomat, capable of skillfully cold shouldering people whose company she abhors. So what, its thirty years since I said ‘I do’ but she hasn’t stopped surprising me.   I also know that you would relish and find mirror image of yours (or better half’s) in the book-to-be but bigger question begging answer is who will save me when she is affront… So dear readers!  Love your wife and if you can’t, at least pretend, for therein and therein alone lies the much elusive peaceful dwelling and ultimately peaceful deliverance from this mortal world.  Amen!

                                       
           



            

Monday, March 26, 2012

भारतीय रेल का पुनरुत्थान – एक चिंतन वज़न कम करें अथवा यही आपको ले डूबेगा


पहले तो मैं चाहूँगा कि बजाय रिजरक्सन के, रिजुवेनेट शब्द का प्रयोग अधिक प्रांसगिक रहेगा कारण कि रिजरक्सन तो मृत का होता है और अभी रेलवे ज़िंदा है अतः ज़रूरत इसे रिजुवेनेट करने की है. माननीय रेलवे मंत्री महोदय ने पिछले दिनों यह कहा कि वे रेलवे को आई.सी.यू. से बाहर निकाल कर लाये हैं और वे नहीं चाहते कि भारतीय रेलवे एयर इंडिया बन जाये. सच है यदि समय रहते प्रयास नहीं होंगे तो ‘डिसइनवेस्ट्मेंट’ और रेलवे को प्राइवेट करने वाली लॉबी टकटकी लगा कर देर से इसे घूर रही है. कोई भी प्राइवेट एंटोप्रॉअनर प्रॉफिट के लिये ही फील्ड में आयेगा. उनके शब्द्कोष में प्रॉफिट डर्टी वर्ड नहीं है. जिस तरह ‘वेलफेयर’ की कोई सीमा नहीं होती उसी तरह ‘प्रॉफिट’ की कोई सीमा नहीं होती है. अधिक से अधिकतर है तो ..बेहतर से बेहतर है.


जब किसी भी संगठन में खर्चे कम करने की बात की जाती है तो उसकी गाज कर्मचारियों पर गिरती है. एक कहावत है कि आप आने वाले कल की लड़ाई बीते हुए कल की तकनीक से नहीं जीत सकते. वर्तमान में प्रति वर्ष लगभग 15,000 रेल कर्मी रिटायर हो रहे हैं. जबकि मैंन पॉवर उस रेट से नहीं आ रही है. इसलिये यह जरूरी है
कि :




1. ऑफिस की विभिन्न प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाये.


इस एरिया में सुझाव यह हैं कि ‘एक डैथ एक नौकरी’ के नियम को पूरी तरह मान्यता देते हुए इसे प्रमुखता से प्रसिद्ध किया जाये. प्रक्रिया सरल होगी तो समय की बचत होगी, और मैंन पॉवर जल्दी उपलब्ध हो सकेगी. आप चाहें तो भले इसके लिये परीक्षा आर.आर.बी के स्तर की रखी जा सकती है और उसे कर्मचारी की सी. आर से लिंक किया जा सकता है. यह सुविधा ‘मेडीकली अनफिट फॉर ऑल कैटेगरी’ को भी दी जा सकती है. सी.आर. के केस में भी केवल दो ही कॉलम रखे जायें ‘फिट फॉर प्रोमोशन’ ‘नॉट फिट फॉर प्रोमोशन’ क्या ज़रूरत है पांच-पांच कॉलम रखने की जब अगले ने देनी बौद्ध् धर्म के मध्यम मार्ग की तर्ज़ पर सबको ‘गुड’ ही है.


2. रेल कर्मियों को मल्टी-टास्किंग में न केवल ट्रेन किया जाये बल्कि उन्हें इन क्षेत्रों में जाने के लिये ओरियंट भी किया जाये. यथा सभी ग्रुप डी को जरूरी तौर पर वैहीकल ड्राइविग की ट्रेनिंग दी जाये. ऑफिस के दूसरे गैजट्स जैसे फैक्स, फोटोस्टैट, प्रारम्भिक बिजली के यंत्रों की रख-रखाव के एरिया में ट्रेनिंग देना


3. मशीनों पर निर्भरता अधिक से अधिक होती चली जायेगी इसलिये अभी से इसकी आदत डालना शुरु कर दें. जैसे ऑफिस के बहुत से पत्र व्यवहार ई मेल, लैन, कॉन्फ्रेंसिंग, पैन ड्राइव, के माध्यम से. फोन, मोबायल, एस.एम.एस का अधिक से अधिक प्रयोग.
4. ऑफिस रिकॉर्ड जिस हालत में रखा जाता है हम किसी से छुपा नहीं है. इसलिये बेहतर होगा कि हम उपनिवेशवाद की मानसिकता से ऊपर आयें और कर्मचारियों पर विश्वास करते हुए उनको ही ये जिम्मेदारी दे दें कि वे अपना तमाम रिकॉर्ड रखें. आखिर उनसे बेहतर उसका रक्षण और अनुरक्षण कौन कर सकता है. इसी दिशा में लीव की पासबुक और टच स्क्रीन का इस्तेमाल व्यापक तौर पर किया जा सकता है.


5. यह साढ़े नौ से छह बजे की नौकरी का कंसेप्ट पुराना हो गया है..नया ज़माना फ्लेक्सी ऑवर्स का है. पी.सी. घर-घर में हैं...आप नियत काम नियत समय सीमा में पूर्ण करने की शर्त के साथ...स्टाफ पर थानेदारी वाली मानसिकता त्याग दें क्यों कि वे आपको अन्यथा और तरीकों से नज़र बचा कर कामचोरी करेंगे.


6. सभी को ट्रेनिंग कम्पलसरी होनी चाहिये और इस प्रकार सभी स्टाफ को अपने कार्य के अलावा एक अन्य कार्य क्षेत्र की ट्रेनिंग भी दी जानी चाहिये और इस दिशा में वह अपनी रुचि और प्रतिभा से ट्रेनिंग ले सकेगा.


7. आपको अपने ही कर्मचारियों पर विश्वास करना होगा..हमेशा हमेशा उन पर अविश्वास की विरासत हमें अंग्रेजों से मिली है. कारण कि वे कभी भी हिंदुस्तानियों पर विश्वास नहीं जमा पाये थे. न प्रशासन में न राजनीति में न फौज़ में. अत: मक्खी पर मक्खी न मारते हुए हमें एजूकेशन ग्रांट आदि अनेक प्रक्रियाओं का सरलीकरण करते हुए उसे वेतन के साथ लगा देना चाहिये. इसी प्रकार रेल कर्मी को यह छूट होनी चाहिये कि वे चाहें तो अपना इलाज़ प्राइवेट में करा लें और डाइरेक्ट अस्पताल को आप रिम्बर्समेंट कर दें. आज भी कहा तो यही जाता है कि रेलवे अस्पताल तो केवल यूनियन के लोगों और बड़े बड़े ऑफिसर्स के लिये ही है.


8. प्रॉफिट सेंटर का एक कंसेप्ट प्राइवेट में चलता है जिसमें हर यूनिट हर कर्मचारी एक प्रॉफिट सेंटर होता है उससे यह अपेक्षा होती है कि वह न केवल अपनी पगार कमायेगा बल्कि साल के अंत में उसका यह ऑडिट भी किया जाये कि उसने ऑर्गानाइजेशन को कमा कर कितना दिया. हमारे यहां भी रेलकर्मी को यह टारगेट दिया जा सकता है.


9. सेफ्टी पोस्ट के भूत से बचने के लिये यह ज़रूरी है कि इस पर एक रिव्यू किया जाय कि ये यार्ड स्टिक आखिर है क्या. अब इनफॉरमेशन, टेक्नॉलोजी और जनरल एजुकेशन बढ़ जाने से यह जरूरी हो गया है कि हम बजाय क्वांटिटी के क्वालिटी पर कंसंट्रेट करें. इसके लिये बहुत से टफ फैसले भी दरकार होंगे जिसके लिये आपको यूनियन से पूरी मदद लेनी होगी और उसके लिये आपको अपना एज ओल्ड आइडिया त्यागना होगा कि यूनियन टांग अडायेगी ऐसा नही है. बहुधा देखा यह गया है कि मैंनेजमेंट वाले ही ज्यादा दकियानूसी निकलते हैं . आप एक बात समझ लें कि यदि आप यूनियन को बुरा समझते हैं तो यूनियन का न रहना और भी ज्यादा बुरा होगा, दोनों के लिये ऑरगानिजेशन के लिये भी और आपके लिये भी.


10. एक नियम है जिसके अंतर्गत यदि कोई भी पद एक सीमा से अधिक खाली रहता है तो वह स्वत: ही समाप्त मान लिया जाता है. यदि उसे भरना है तो पहले उसे जीवित करना होता है जिसकी लम्बी और क्लिष्ट प्रक्रिया है. उसी तर्ज़ पर सीधी सीधी बात है कि यदि आप बिना उस पद के भरे हुए काम चला सकते है तो सदैव क्यों नहीं. एक इस नियम को सख्ती से लागू करने मात्र से आपकी मैन पॉवर काबू में आ जायेगी.


ऐसा हो सकता है कि आप ये सुझाव बहुत ‘सिम्पल’किस्म के और छोटे-छोटे लगें. एक बात है बड़े-बड़े फैसले आप लेने से बचते रहेंगे और छोटे फैसलों को छोटे कह कर टालते रहेंगे तो फैसले लेगा कौन. एक थानेदार जब किसी की मृत्यु पर गांव गया तो लगा खूब मिठाई खाने, किसी ने टोका तो उसका कहना था कि “ वाह बेटा खुशी के मौके पर तुम मुझे बुलाओ नहीं और ग़म के मौके पर मैं नहीं खाऊं तो मिठाई मैं खाऊंगा कब ? वह पल जब आपको फैसला लेना है वह अब है अन्यथा भविष्य में आप भी इल्ज़ाम से बच नहीं पायेंगे. अगर अच्छे मैंनेजमेंट के लिये हम सभी क्रेडिट लेने को टूटे पड़ते हैं तो मिसमैंनेजमेंट के लिये कोई और क्यों आयेगा..यूं लगाने को आप किसी पर भी आरोप लगा सकते हैं.होगा भी यही यूनियन कहेंगी मैंनेजमेंट की ग़लती है और मैंनेजमेंट तो बहुधा कहती ही है कि यूनियन न होती तो वे तारे तोड़ कर ला सकते थे, कृपया याद रखें कि कोई भी सदैव न तो आई.सी.यू. में रह सकता है और न ही अस्पताल में रहना चाहता है. हम सभी अस्पताल से जल्दी से जल्दी बाहर आना चाहते हैं और वो भी स्वयं के पैरों से चल कर.





Thursday, February 2, 2012

QUO VADIS RAILWAY?



STORY-1 : Top brass of Ministry of Railways has directed that there should be austerity in various spheres of Railway life. Towards this end, several austerity measures have been introduced, principal being cut in Over Time Allowance and Travelling Allowance and deferring its payment where already due. Several years of ‘No hike’ tariff policy has led to severe financial crunch, in turn, necessitated an unprecedented rise in fare subject to, of course, political compulsions arising out of and in the course of courtship with government’s alliance partners.

STORY-2 : With 19 Railway Recruitment Boards enjoying siesta in hibernation, no or negligible recruitment has taken place during the past several years. That does not mean men have not been inducted in Railways. The Indian Railways has many other ‘inlets’. On Sports ground annually hundreds of sportspersons are inducted in Group ‘C’ and ‘D’. Similarly, inflow in Scout & Guide, Cultural Quota, Minister’s Quota, Bungalow Peon continues unabated. Last but not the least, compassionate ground appointments to the wards in lieu of Railwaymen dying/medically decategorised while in service.

An additional whopping wage bill of 300 crores per year is going to be thrust upon Railways in the ensuing few months when a contingent of strong support staff (class IV) enters the already surplus rank and file of Railwaymen in the name of ‘safety’.

It is amusing to know that the mandarins of Rail Bhavan think that the ‘safety’ can be ensured by these lowest rung green horns.


Sunday, January 22, 2012

व्यंग्य: त्योहार प्रधान हिंदुस्तान

 आपने बहुत बार सुना होगा कि भारत एक कृषि प्रधान ( पढ़ें कुर्सी प्रधान) देश है या गांव प्रधान (पढ़ें फार्म हाऊस प्रधान) देश है. भारत में तीन प्रमुख फसलें होती है. रबी और खरीफ. तीसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है रिलीफ. बाढ़ हो, सूखा हो या फिर भूकम्प हो, सभी में रिलीफ की फसल लहलहाती है. अब भारत इतना विशाल और विविधताओं वाला देश है कि रबी, खरीफ वाले भले बेरोज़गार बैठे रहें या आत्महत्याओं में व्यस्त रहें, ‘रिलीफ’ वाले बरस भर फसल काटते है.


आप गौर करें तो पायेंगे कि भारत वास्तव में एक त्योहार प्रधान देश है. भारत 33 करोड़ देवी देवताओं की पावन भूमि है. अब 33 करोड़ देवी देवताओं की पूजा अर्चना को जनसंख्या भी बहुत चाहिये. हम बहुत धार्मिक किस्म के लोग हैं. जैसे ही हमें पता चला कि इतने सारे देवी देवता हैं और पूजने वाले कम पड़ रहे हैं बस फिर क्या था हम पिल पड़े और एकदम गदर मचा दिया. यहां तक कि चैम्पियन टीम चीन को भी अपनी इज़्ज़त बचाने के ‘वांदे’ हो गये. लोग कह रहे है कि एथेंस ओलम्पिक में चीन ने बहुत सारे पदक जीते जबकि भारत बड़ी मुश्किल से अपना खाता खोल पाया. भई इस वक़्त हमारी प्राथमिकता चीन को जनसंख्या के अखाड़े में पटखनी देना है. एकदम चारों खाने चित्त करना है. उसके बाद ओलम्पिक खेलों पर ध्यान देंगे. फर्स्ट थिंग फर्स्ट. खेल जरूरी है या कि इज़्ज़त बचाना ? और इज़्ज़त बचाना कोई खेल नहीं है. ये इश्क़ नहीं आसां.


भारत की पावन उर्वरा भूमि पर त्योहारों की खूब भरमार है. हर दिन कोई न कोई त्योहार है. जैसे पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये और बहानों की कोई कमी नहीं. आज मूड बहुत खराब है. आज मैं बहुत खुश हूं. आज बॉस से खट्पट हो गयी है. आज तो बहुत थक गये. आज जरा ज़ुकाम सा लग रहा है. आज गला खराब है. आज बदन टूट सा रहा है आदि आदि. उसी तरह श्राद्धालुओं को त्योहारों की कोई कमी नहीं.


अब आप होली को ही ले लें. यह बड़ा अच्छा त्योहार है. भांग खाइये, ठंडाई पीजिये. गरज़ कि दिन में ही पीने-पिलाने के त्योहार का नाम होली है. आप ग्रीज-पेंट लगायें. मिलावटी गुलाल लगायें और अपनी सोसायटी की सारी भाभीजीस को बे-रोक-टोक जेम्स बॉन्ड बन कर गुब्बारे और पिचकारी मारें. इसे कहते हैं ‘लाइसेंस टू किल’ होली के बाद डॉक्टरों खासकर स्किन और नेत्र विशेषज्ञों की मौज रहती है. होली के बाद इनकी होली मनती है. लोग होली पर गले मिलते हैं. जिससे जितना बड़ा काम अटका है उस से उतना प्रगाढ‌ और देर तक गले मिलना होता है. सब चिल्लाते हैं. बच्चे खुश होते हैं अपनी शरारतों से. बड़े खुश होते हैं और बच्चों की तरह किलकारियां मार कर भीगते-भिगोते हैं. दोपहर से ही रेडियो-टी.वी वाले हर साल की तरह खबर देते हैं. ‘देश भर में होली का त्योहार पूरे उल्लास और शांतिपूर्वक तरीके से मनाया गया. फलां फलां ने देशवासियों को इस अवसर पर अपनी शुभकामनायें दीं’ ये शुभकामनायें सूखी-सूखी होती हैं. सिक्योरिटी कारणों से वे या तो होली खेलते नहीं या फिर केवल अपने सिक्योरिटी गार्ड्स के साथ ही खेलते हैं. शाम को बॉस लोगों के घर जाने का रिवाज होता है ताकि दिन की भीड़ में अगर ‘नोटिस’ नही भी हुआ तो बॉस की चौपड़ी में हाज़िरी अर्थात ‘पी’ तो लग जाये. ‘पी’ फॉर पॉलिश.


दीवाली के बारे में लिखना बिजली की रंग-बिरंगी लड़ी को दिया दिखाने के समान है. यह हमारा अखिल भारतीय पॉलुशन डे है. आप बावेला ना मचायें इसलिये मशहूर ये कर दिया गया है कि इस से मक्खी- मच्छर मर जाते हैं. घर-बाहर की सफाई हो जाती है. दीवाली लाइट्स और बमों का त्योहार है. बम जो शिवकाशी में बंधुआ बाल मज़दूर बनाते हैं और हर बरस आग लगने से बड़ी संख्या में ज़िंदा जल जाते हैं. आतंकवादियों की स्पॉन्सरशिप में आजकल बरस भर बड़े बड़े बमों की मारामारी रहती है. उसके आगे दीवाली के बम ऐसे ही ‘फुस्स’ मालूम देते है जैसे कि चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार.


दीवाली दरअसल हमारे देश की जी.बी.एम है. जनरल बॉडी मीटिंग ? नहीं नहीं ! गैम्बलिंग, ब्राइब और मदिरा. यह रिश्वत लेने देने का ऑफिशियल त्योहार है. लोग जुआ और शराब पूरी श्रद्धा के साथ ‘बापरते’ हैं. मना करो तो मानते तो वैसे भी नहीं. उल्टा लड़ने को आते हैं. “ क्या मतलब है ? और दिन चंगा त्योहार के दिन नंगा” जिन लोगों ने बरस भर एक केला भी नहीं खाया-खिलाया होता वो भी ड्राई फ्रूट्स के डिब्बे उठाये उठाये फिरते हैं. वो अलग बात है कि डिब्बे दिखने में ही बड़े होते है और उनमें चतुराई से सज़ाये छंटाक छंटाक भर ड्राई फ्रूट से ज्यादा नहीं होते. बाज़ार सज़ जाते है. दीवाली ‘सेल’ के बोर्ड लग जाते हैं. लोग टूट कर पड़ते हैं और ऐसे खुश होते हैं जैसे उल्टे ये ही दुकानदार को ठग आये हों. फायर ब्रिगेड वालों की इन दिनों वैसे ही मांग होती है जैसे फायर फिल्म के बाद बोल्ड बट पूअर हीरोईनों की हो चली है. पूअर इसलिये कि फिल्म का बजट चाहे कितने ही करोड़ का क्यों न हो, उसको तन ढांपने को कपड़े नही देने हैं बैरी प्रोडयूसर ने. बेचारी को या तो चीथड़े पहनने पड़ते हैं या फिर हीरो की टाई में से ही अपने लिये कपड़े निकालने पड़ते हैं.


ईद मुख्यत: दो तरह की होती है. एक में सेमरी (सेवेय्यां) खाने को मिलती है दूसरे में बकरी या बकरा. हर साल ईद के मौके पर दो फोटो अखबार में जरूर छपते हैं. एक में दो बच्चे गले मिलते हुए दिखाये जाते हैं. दूसरे में हिन्दू-मुस्लिम गले मिलते दिखाये जाते हैं. ‘जाने कहाँ गये वो लोग ?’ (फोटो खिंचा कर) नेताओं के बयान बदस्तूर वैसे ही आते है. तमाम हिंदुस्तानियों को मुबारकबाद और रेडियो टी.वी. की घिसी-पिटी खबर कि ये त्योहार बड़ी धूमधाम से पूरे देश में मनाया गया. ईद पर नये कपड़े पहनने का रिवाज़ है. टी. वी. पर बहू-बेगम, ताज महल या ऐसी ही कोई फिल्म दिखाई जाती है. कोई विदेशी अगर भारतीय फिल्में देखे तो सोचेगा कि भारत एक हैपी- गो- लकी देश है. जहां हर वक़्त प्यार-इश्क़-मुहब्बत की बहार रहती है. घर घर में प्रेम का रिवाज़ सा है. प्यार-मुहब्बत के तराने हमेशा लोगों के होठों पर रहते हैं और वो जब तब यानि कि बात बात में गाने लगते है. दरअसल उन्हें नहीं मालूम यहां ‘भगवान’ भी गरीबी और गुमनामी में मरता है.


क्रिसमस का जैसा जोर-शोर हमारे यहां होता है सम्भवत: इंग्लेंड और यूरोप में भी न होता होगा. दरअसल हम हर वो त्योहार मनाना चाहते हैं जिसमें पीन-खाना हो. थोड़ी मस्ती हो. क्रिसमस और नये साल से जो बधाई पत्रों का सिलसिला चला है वो अब जीवन के हर इलाके में पहुंच गया है. हर बात या कहना चाहिए बात बात के लिये ग्रीटिंग कार्ड ‘बाज़ारवाद’ ने आप तक पहुंचा दिये हैं. बाज़ारवाद ने हमारे घर-त्योहार, सम्बंधों सभी में घुसपैठ कर ली है. हम न्यू ईयर ऐसे मनाते हैं कि अमेरिका वाले भी शरमा जायें. वास्तव में क्रिसमस से पीने-पिलाने, मौज़-बहार का जो सिलसिला शुरु होता है तो वह नव वर्ष तक चलता है. हमारे यहां साल के पूर्वार्ध में आपने जो कमाया-बचाया होता है, त्योहारों, उकसावों और बाज़ार के चलते साल के सेकंड हाफ में उसे फूंकना होता है. उसके बाद फिर वही प्रॉविडेंट फंड में से उधारी, क्रेडिट कार्ड और लोन मेला. कबीर जानते थे ये होगा:-


‘कबीरा खड़ा बाज़ार में लिये मुराडा हाथ
जो घर जारै आपना, चले हमारे साथ'


हम लोग सदियों से ये त्योहार मना रहे है. हर बरस हज़ारों लाखों रावण जलाये जाते हैं. मगर रावण हैं कि जितने जलते नहीं उस से अधिक पैदा हो रहे है और उनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है. दीवाली हो ईद, क्रिसमस या होली हो, सबका पैगाम अगर प्यार-मुहब्बत है तो एक बात बताइये इतनी नफरत क्यों है चारों ओर ?.






Wednesday, November 23, 2011

व्यंग्य : मेरे अंगने में ....

अमरनाथ उर्फ आशा देवी की अमर बनने की आशाओं पर उस वक़्त तुषारापात हो गया जब अदालत ने उन्हें मर्द घोषित कर दिया और उनसे महापौर का पद छीन लिया जो उन्होनें हिजड़ा बन कर हासिल किया था. पॉलिटिक्स में पुरुषत्व का महत्व है और पुरुषों का अधिपत्य है. यह नामर्दों का काम नहीं. खासकर उन मर्दों का तो बिल्कुल ही नहीं जो पॉलिटिक्स के लिये नामर्द तक कहलाने को तैयार हों, ये माना लोग देश सेवा के लिये बडे‌ से बड़ा त्याग करने को तत्पर रहते हैं. मगर 1857 से लेकर आज तक ऐसा कोई उदाहरण देखने में नहीं आया जबकि किसी ने अपनी मर्दानगी ही त्याग दी हो.
वैसे देखने में यह आया है कि अक्सर अच्छे खासे मर्द पॉलिटिक्स में जाने के बाद नामर्द बन जाते हैं. मगर वो अलग किस्सा है. कभी टिकट के लिये रोना, कभी पार्टी फंड के लिये रोन, कभी पार्टी प्रेसिडेंट के आगे घुटने टेकन, कभी सी.बी.आई. के आगे रोना, गिड़गिडाना. अच्छे भले घर से मर्द निकले थे बेचारे नपुंसक बन के रह जाते हैं.
यह अदालत का ऐथासिक फैसला है. कारण कि हिज़डे‌ खुश थे चलो अब उनकी भी भारत की राजनीति और सत्ता के गलियारों में सुनवाई हुई. अब ‘जैनुइन’ नपुंसक भी चुने जायेंगे. मगर देखते हैं कि इस क्षेत्र में भी घुसपैठ हो गई और मिलावट आ गई. समाज का कोई हलका बचा नहीं है जिसमें मिलावट न हो गई हो. अब आप ही बताइये ऐसे में हिजड़े कहां जायें. बच्चों के पैदा होने पर आपने पह्ले ही बंदिशें लगा दी हैं. हिजड़े बेचारे कभी राज़ा महाराज़ाओं के हरम के पहरेदार थे अब ट्रैफिक सिगनलों पर भीख मांगते फिरते हैं. मगर उसमें भी सुनते हैं बेरोज़गार लड़के हिजड़े बन उनके बीच आ घुसते हैं.
लव के लिये कुछ भी करेगा. वैसे ही पॉवर के लिये कुछ भी करेगा. आप बोलेगा हिजड़ा ? हम बोलेगा “ जी हज़ूर” आप पूछेंगे नपुंसक ? हमारा उत्तर “ बिलकुल ज़नाब ! हम तो खानदानी नपुंसक हैं, हमारा बाप भी नपुंसक था”
जब मध्य प्रदेश में पहला हिजड़ा एम.एल.ए बना था तो एक सुरसुरी सी छा गई थी देश के राजनैतिक क्षितिज़ पर. कमला सभी विरोधियों की मर्दानगी को रौंदती हुई जीती थी. पार्टी बॉसस के मुंह खुले के खुले रह गये. ये क्या हुआ ? अब हम क्या करेंगे ? मर्द लोग नामर्दों से हार गये. जनता ने अपना फैसला सुना दिया था. एक किन्नर ने बाकी सबको किनारे लगा दिया था.


अब न्यायालय ने आशा देवी को मर्द बता कर उसकी नामर्दी पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. नामर्द बनना कोई हंसी ठठ्ठा नही है. ये हर एक के बस की बात नहीं. ये इश्क़ नहीं आसां. आशा देवी अब अपील में जायेंगे या जायेंगी और अपने आप को ‘नामर्द’ घोषित कराने के भरसक प्रयास करेंगी या करेंगे. ठाकुर यह नामर्दी मुझे दे दे ...दे दे .. आखिर महापौरी का सवाल है. नही तो फिर और क्या रह जायेगा. वही ताली पीट पीट कर जचगी में नाचना गाना.

एक बार फिर नेताओं ने साबित कर दिया कि नामर्दों की उनकी दुनियां में मर्दों का कोई काम नहीं. वे नकली नामर्दों को ढूंढ ही निकालेंगे और फिर उनसे पूछेंगे “ मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..?”






Tuesday, November 22, 2011

व्यंग्य: गोरों का बोझ

अमेरिका के जनाब रम्सफील्ड ने कहा है कि हम ईराक में जितना जरूरी है उससे एक दिन भी ज्यादा नहीं ठहरेंगे. वाह ! वाह ! क्या स्टेट्मेंट है. क्या ईमानदारी है. साफगोई तो कोई इनसे सीखे. तभी तो इन्होने इतने सारे खुशबू वाले साबुन चला दिये हैं ताकि आप सब भी साफ सफाई रखें. वे इतने सफाई पसंद हैं कि जिस बाज़ार में आप घुसे उसकी सफाई ही कर दी. कपड़ों के बाज़ार में घुसे तो तन से कपड़े साफ. नवयौवनायें अपने अंग प्रत्यंग साफ साफ दिखाने लगीं. उन्होने कह दिया है कि अगर कपड़े पहनने ज़रूरी ही हों तो हमारे अम्रीकी ब्रांड के पहनो. क्या पैंट-कमीज़ क्या कच्छे-बनियान. तुम्हारा दर्ज़ी और उसके बाल-बच्चे गये तेल लेने. कौन झिकझिक करे. नाप देने जाओ फिटिंग दो, ट्रायल दो, डिलीवरी के लिये चक्कर लगाते फिरो. हमारे शो रूम में घुसो और काऊ बॉय बनके बाहर निकलो. आप अपने आप को कितने ही फन्ने खां समझते रहो उनकी नज़र में आप बस तीन साइज़ों में मिलते हो—रेगुलर, लार्ज, एक्स्ट्रा लार्ज. चौथी कोई कैटेगरी ही नहीं. नॉट बैड.
श्री रम्सफील्ड जी वो ही रट लगाये हैं जो सौ बरस पहले तक अंग्रेज भारतीयों के लिये कहते आये थे. इन नालायक भारतीयों को इंसान बनाना हमारी ड्यूटी है. ये वाइट्मैंस बर्डन हैं. जैसे ही ये सभ्य और ठीक हो जायेंगे हम हिंदुस्तान छोड देंगे. देख लो छोड दिया. जैसे ही उन्हें लगा कि अब आम हिंदुस्तानी अंग्रेजी जानना- बोलना चाहता है व अंग्रेजी पढने के लिये भारी रकम और डोनेशन देने को तैयार है. यहां तक कि अपनी भाषा, संस्कार व साहित्य को हेय नज़र से देखने लगा है तो उनकी ड्यूटी पूरी हो गयी. बाद में सर ना उठा सकें इसलिये वो जाते जाते देश का बंटवारा भी कर गये कि बेटा अब उलझते रहो इसी में.
हिज एक्सीलेंसी रम्स्फील्ड ने वही कहा है जो उनके दादा परदादा विश्व में अपनी दादागिरी चलाने को कहते आये हैं. बेचारा अमरीका ..उस पर कितना बोझा है. कभी वियतनाम, कभी ईराक़. आराम नही है. पूरी दुनियां की जिम्मेदारी उसके ऊपर है. सब के ठीक करना है. सब को सभ्य बनाना है ताकि सभी पिज़ा, हाट डॉग और पेप्सी का सेवन करते रहें. निसंदेह अमरीकी अपने वायदे के मुताबिक ईराक़ छोड़ देंगे.बस जरा ये तेल के कुंओं और ठेकों की बंदरबांट हो जाये. आखिर ईराक़ का पुनर्निर्माण उन्ही का तो सिर दर्द है. तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना. मैं चला जाऊंगा ...दो अश्क़ बहा लूं तो चलूं ...सड़कें चिकनी हो जायें जिन पर आयतित कारें दौड़ सकें. शॉपिंग मॉल. कम्प्लेक्स, ओल्ड एज होम, अनाथालय, स्टेट ऑफ आर्ट तकनीक के अस्पताल बन जायें. केंटकी चिकन और पिज़ा होम बन जायें. डिस्को और मायकल जैक्सन चल जायें. जिस दिन आम ईराक़ी अपनी भाषा, साहित्य और संस्कारों और कुछ भी ईराक़ी से हेट करने लग जायेगा वो चले जायेंगे. वे इंतज़ार में हैं कि कब आदाबअर्ज़ की जगह आम अमरीकी हाय कहने लग जाये. खुदा हाफिज़ की जगह ‘कैच यू लेटर’ कहने लगे. बस ! लो कट टॉप और जींस जरा चल निकलें. रीबॉक और नाइक (या कि नाइकी) लोग बाग अपना लें.अरबी, फारसी बोलने वालों को ज़ाहिल तथा अंग्रेजी बोलने वालों को ज़हीन समझा जानेलगे.फिर उनकी ज़रूरत ही नहीं रहेगी. वो कह ही रहे हैं कि जितना ज़रूरी होगा उससे एक दिन भी बेसी वो ईराक़ में नहीं रहेंगे. वो वायदे के पक्के हैं. देखिये डेढ- सौ साल बाद जैसे ही काले अंग्रेज फील्ड में आये गोरे अंग्रेजों ने जहाज पकड लिया था कि नहीं. तब ? जैसे ही ईराक़ वाले अब्बा को डैड और अम्मी को मॉम कहने लगेंगे, अंकल सैम किसी और देश को आज़ाद और सभ्य बनाने को निकल पड़ेंगे. यू नो, बेचारे गोरों पर सचमुच ही बहुत बोझ है. डोंट यू थिंक सो ?






Monday, November 21, 2011

व्यंग्य: भैंस तेरी यही कहानी

रंग भेद की नीति पहले अफ्रीका में जोर शोर से थी. आज यह नीति अफ्रीका में मृत प्राय: है. हमारे देश में भी सदियों से रंगभेद जारी है. हम मानते नहीं हैं मगर प्रैक्टिस करते हैं क्यों कि हम विश्व में हिपोक्रेट नम्बर वन हैं. अन्यथा आप ही बताईये जहाँ चूहों का मंदिर हो, सांप की पूजा होती हो, बिल्ली मौसी हो, बंदर मामा हो, गाय माता हो और मोर से छेड़छाड़ राष्ट्रीय अपराध हो वहां भैंस को ना कोई पदवी-उपाधि ना कोई मंदिर चौबारा. क्या सिर्फ इसलिये कि वह काली है. वह कब से आपकी इस रंगभेद नीति का शिकार है मगर फिर भी चुपचाप आपको दूध दिये चली आ रही है. आप उसे इंजेक्शन लगा लगा कर उसके दूध की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेते हैं. उसे गंदगी में रखते हैं. रूखा-सूखा खाने को देते हैं और नहीं तो वह पॉलीथिन बैग ही खाती फिरती है.
किसी समाज की भाषा व साहित्य उस समाज का दर्पण होता है. हिंदी भाषा तथा लोक साहित्य में जो मुहावरे व लोकोक्तियां हैं वह भी भैंस के साथ पक्षपात करती हैं. न्याय नहीं करतीं.

जिसकी लाठी उसकी भैंस : अरे भई अब लठियों का ज़माना नही रहा. किस सदी में जी रहे हैं आप. अब तो टाइम है मानव बम का, ए.के. 47 का. लाठी तो अब केवल कुत्ते-बिल्ली को डराने-धमकाने के काम आती है. यह कहावत भैंस के साथ अन्याय है और उसे ‘पूअर लाइट’ में रखता है. नवीन मुहावरा होना चाहिये ‘जिसकी ए.के.47 उसका इंडिया 1947’ आप अपने दिल पे हाथ रख कर बताइये क्या यह अधिक प्रासंगिक नहीं .

भैंस के आगे बीन बजाना : दूसरा मुहावरा है, यह भैंस का सरासर अपमान है. षड्यंत्र यह है कि कैसे भैंस को अन्य तथाकथित अभिजात्य पशु-पक्षियों से नीचे दिखाया जाये. आप साबित क्या करना चाहते हैं कि भैंस संगीत प्रेमी नही है. ललित कलाओं का उसे कोई ज्ञान नहीं है. वह फूहड़ है. बच्चू याद कीजिये उसी का दूध पी-पी कर आप इतने बढे हुए हैं.

यह रीति पुरानी है जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो. आज भी नव माताएं भैंस का ही सहारा लेती हैं ताकि उनकी ‘फिगर’ बनी रहे. भैंस का क्या ? वह तो ‘डिस फिगर है ही और यदि भैंस के आगे बीन बजा बजा कर आपको वाह-वाही नहीं मिली तो जाईये किसी और के आगे बजाईये और लिख दीजिये उसका नाम आखिर भैंस ने आपसे कहा नही कि “ हे बीनवादक ! अपनी बीन सुनाओ” वैसे भी आज आपकी बीन सुनता ही कौन है. रेडियो, टी.वी वाले भी रात को साढे‌ ग्यारह बजे से पहले का टाइम नहीं देते ताकि तब तक सब सो जायें.

काला अक्षर भैंस बराबर : भई ये तो हद ही हो गयी यानी कि भैंस अनपढ‌ है. पहले तो आप उसे पढ़ने लिखने ना भेजें , उसे बाहर किसी से मेल-जोड‌ बढाने ना दें जो कि उसका ज्ञान-ध्यान बढे. फिर आप उसे जाहिल गंवार कहें. वैसे भी आप बताईये और किस जानवर ने कितने डिग्री डिप्लोमा पास कर लिये जो बेचारी भैंस के पीछे पड़े हैं. आप भूल रहे हैं कि भैंस तो भैंस भारत में मनुष्यों का कितना प्रतिशत साक्षर है. फिर भैंस के साथ ही यह बे-इंसाफी क्यों ? है कोई जवाब आपके पास. एक तो आपको दूध दे, ऊपर से आपके टौंट भी सुने. भैंस दूध देना बंद कर दे तो बच्चू सब सिट्टीपिट्टी गुम हो जायेगी. बताईये फिर आप किस बी.ए. पास जानवर का दूध पीना चाहेंगे ? शेरनी का ? जो आपको बाल्टी समेत खा जायेगी.

हो ना हो ये कोई ‘हाई लेवल’ का ‘प्लाट’ है अन्यथा आप ही सोचिये कि भैंसा जो कि यमराज की सवारी है वह चाहता तो किस की मजाल है जो भैंस को टेढी आंख से भी देखे. किसी दिन जब यमराज मूड में होते धीरे से कह देता कि “सर वाइफ को थोडा प्राब्लम है” मगर नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ. पता नहीं यह क्या चक्कर है. जिसका हसबैंड इतनी ‘एप्रोच’ वाला हो उसकी मिसेज को ये दिन देखने पडें. कभी मुझे लगता है यह कहीं डाइवोर्स या सैपरेशन का मामला ना हो. भैंस भी स्वाभिमानी है उसने ‘मेंटीनेंस’ लेने से इंकार कर दिया हो “ जा हरज़ाई मैंने तुझे हमेशा हमेशा के लिये भुला दिया”

भैंस को इतना ‘नेगलेक्ट’ कर रखा है कि कोई चुनाव चिन्ह के तौर पर भी भैंस चुनाव चिन्ह नहीं रखता. क्यों ? गाय, बैल, बछडा, हाथी, घोडा यहां तक कि गधा भी चुनाव चिन्ह है. तो महाराज आप ‘कनविंस’ हुए कि नहीं कि भैंस के साथ सदियों से दुर्व्यवहार हो रहा है. समाज में उसे उचित स्थान दिलाने के लिये उठ खड़े होइये.



"हर जोर ज़ुल्म की टक्कर में


इन्साफ हमारा नारा है"



अब वक़्त आ गया है कि भैंस को उसका ड्यू दिलाया जाये. सर्वप्रथम तो उसे भाभी, चाची, ताई, दीदी या जो भी अन्य आदर सूचक रिश्ता उससे नवाजा जाये. मेरी गुहार है ‘एनीमल सोसायटी’ वालों से कि इस ज्वलंत विषय पर तुरंत ध्यान दिया जाये. यह काम इलैक्शन से पहले ही निपटा लिया जाये नहीं तो इलैक्शन कोड के चलते आप बंध जायेंगे. मैं नहीं चाहता कि इस सेंसिटिव विषय को और विवादास्पद बनाया जाये. पहले ही क्या विवादों की कमी है. क्यों कि बात नहीं बनी तो फिर आप लोग ही कहेंगे कि गई भैंस पानी में.