Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Thursday, May 22, 2025

व्यंग्य: प्रेमिका का पिता और कार से कुचलना

 


जब एक पिता ने अपनी पुत्री को प्रेमी के साथ कार में बैठे देखा तो उसे क्रोध आना स्वाभाविक था। उसने वहीं कार रोक कर दोनों को खूब कूटा। खूब कूटा बोले तो खूबैई कूटा। इस पर प्रेमी का सब्र जवाब दे गया। असल में एक सीमा तक तो वह सहता रहा आखिर भावी ससुर साब हैं। ससुर पिता समान होता है। लेकिन उसकी चुप से ससुर साब और उत्साहित हो उठे। उन्होने मार-कुटाई का क्रम जारी रखा। तब ही वो क्षण आया जब उसे लगा बस बहुत हो गया। उसने आव देखा ना ताव, अपनी कार स्टार्ट की और दे मारी ससुर को। ससुर साब ने दो-चार कलामंडी खाईं और चारों खाने चित्त हो गए। अब भले लोग बॉक्सिंग मैच की तरह वन, टू, थ्री करते रहे मगर ससुर साब तो अचेत हो गए थे। ये देख प्रेमी महोदय कार चला कर सीधे थाने ही चले गए।


यह एक 'स्मार्ट मूव' था। एक बात है जब आदमी प्रेम करता है तो कितना समझदार हो जाता है। समझदार ना भी हो चंट-चालाक तो हो ही जाता है। अब देखो उसने थाने जाकर प्रेमिका का दिल जो है सो फिर से एक बार और जीत लिया। वह बाद में प्रेमिका को कह सकता है मेरे मन में पश्चाताप हिलोरें ले रहा था। मेरा ‘पापाजी’ पर कार चढ़ाने का कोई इरादा नहीं था। गुस्से में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। बहुत संभव है कार को भी गुस्सा हो। आखिरकार,  कार मेरी है वो कैसे अपने मालिक का अपमान सह सकती थी। 

प्रेमिका ने फिर उसकी सब बातों पर यकीन कर लेना है। मरहम-पट्टी के बाद फिर सब सुख से रहने लग पड़ेंगे या फिर ससुर साब चलती कार से ऐन मौके पर दायें-बाएँ हो जाने की आर्ट सीख रहे हों। सोचने वाली बात ये है कि फर्ज़ करो ये प्रेमी महोदय अगर कार की जगह सैनिक होते और बख्तरबंद गाड़ी या फिर टैंक चलाते होते तो ? एयर फोर्स में होते और लड़ाकू विमान चालक होते तो क्या अगले के मकान पर गोले गिरा देते ? या मिसाइल छोड़ देते ? ये प्रेमिका के बाप पर कार चढ़ा देना कोई समझदारी का काम नहीं किया प्रेमी महोदय ने। एक 'बैड एक्जाम्पल' सेट किया है भावी प्रेमियों के लिए। जबकि प्रेमिका के पिताओं के लिए खतरनाक 'प्रिसिडेंट' दिया है। सुनते हैं प्रेमीजन अपनी जान हथेली पर रख कर प्रेम करते हैं। वो तो ठीक है मगर प्रेमिका की जान को तो अपनी जान से ज्यादा चाहना चाहिए और हिफाज़त करनी चाहिए ना कि अगले के ऊपर कार चढ़ा देनी चाहिए। बुरा हो ऐसी कार का। ऐसी कार के मालिक का। बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला। काला नहीं तो खून में लालम-लाल।  



प्रेम के सब दुश्मन हैं इस ज़माने में। कैसा लगेगा जब ये दोनों प्रेमी -प्रेमिका विवाह बंधन में बंध जाएँगे ? कैसे वो ये कार की घटना उर्फ दुर्घटना को याद किया करेंगे ? कैसे दादा जी अपने नाती-पोतों को कहानी सुनाया करेंगे ? मुझे तो सोच सोच कर ही रोमांच हो उठता है।

व्यंग्य: श्रीदिल्ली से नई दिल्लीजी तक

 

           

       आजकल शहरों के नाम बदलने का फैशन चल रहा है। जहां ध्यान नहीं जाता वहाँ बिना रुके जागरूक नागरिक, जब सब सोते हैं वो जागकर कालिख पोत आते हैं। यह बहुत पुरानी परंपरा है। यहाँ तक कि दिल्ली ही न जाने कितनी बार बसी है और हर बार नए नाम से। जो कभी कर्ज़न रोड था अब कस्तूरबा गांधी मार्ग हो गया। जो कभी किचनर रोड था वह सरदार पटेल मार्ग बनी दिया गया। इतना ही नहीं हार्डिंग ब्रिज और मिंटो ब्रिज भी तिलक ब्रिज और शिवाजी ब्रिज बना दिये। सबसे सस्ता सौदा यही है। ना हींग लगे न फिटकरी। बस कागज पर ही लिखना/बदलना है और अपने कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है। यह हमारा तरीका है अपने महापुरुषों को सम्मानित करने का। जब नाम बदलने मात्र से लोग खुश हो जाते हैं तो निर्माण के झमेले में कौन पड़े। यह खर्चीला पड़ता है और फिर वो क्वालिटी आने से रही। 


         हमारे पुल आपने देखे हैं उनकी लाइफ दो-चार महीने या हद से हद दो-चार साल होती है। हम जीवन ‘दर्शन’ से परिचित हैं। ये जीवन क्षण भंगुर है। शायर कह-कह के मर गए 'ये ज़िंदगी चार दिन की है'। जब ये ज़िंदगी चार दिन की है तो ऐसी चीज़ बनाने से क्या लाभ जिसकी आयु चार दिन से ज्यादा हो। उस हिसाब से देखो तो ये पुल, ये पुतले, ये सड़क लंबे चल गए। 


       हर जगह का नाम बदलना प्रैक्टिकल नहीं। कहीं कुछ झमेला, कहीं कुछ और। अतः इसका भी एक नायाब तरीका खोज निकाला गया है।  सच ही कहा है ज़रूरत ईज़ाद की माँ है। अब आप बिना नाम बदले अपने दिल के अरमान निकाल सकते हैं और पब्लिक में ये संदेश भेज सकते हैं कि आप कितने पब्लिक स्पिरिटड हैं। बस शहर के नाम के आगे श्री लगा दीजिये। जहां नाम के आगे ‘श्री’ लगाना संभव ना हो (जैसे नाम अगर स्त्रीलिंग हो, वैसे तो श्रीदेवी है ही) तो नाम के पीछे ‘जी’ लगा दीजिये। लो जी ! सुना है कभी इससे सस्ता, सुंदर और टिकाऊ तरीका। अब शेक्सपियर महोदय से पूछिए उन्हें यह पता नहीं होगा कि हम भारतीय नाम से कितना बड़ा टूर्नामेंट खेल सकते हैं। ना केवल खेल सकते हैं बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी जनता जनार्दन को 'खिला' भी सकते हैं। यह बात अगले को अगर पता होती तो वह कभी नहीं लिखता ‘वाट्स इन नेम....’ 


अब अगर मुझे बयान करना हो तो मैं कहूँगा मैं नई दिल्लीजी का रहने वाला हूँ। मैंने श्री बंगलोर सॉरी श्रीबंगुलुरु में शिक्षा ग्रहण की है। मैं हैदराबादजी में रहा। श्रीनासिक में भी फिर वापिस नई दिल्लीजी में आ गया। श्रीरतलाम में मेरे पहली पोस्टिंग थी तत्पश्चात मैं कोटाजी और श्रीभावनगर रहा फिर श्रीजयपुर आ गया और मुंबईजी में भी बरसों रहा। श्रीवडोदरा और सिकन्दराबादजी में भी रहा हूँ।

Tuesday, May 20, 2025

व्यंग्य: हमारी डिग्री - थर्ड डिग्री


 

      अब से पहले कभी ये पढ़ाई-लिखाई, ये डिगरी - सिगरी को कभी पब्लिक में चर्चा लायक भी नहीं समझा गया। अब देखता हूँ जिसे देखो डिग्री का मखौल सा बना रहा है। डिग्री भी एक से बढ़ कर एक। ऐसे-ऐसे कोर्स चला दिये हैं और डिग्री को इतना सुलभ करा दिया है मुझे लगता है इस रफ्तार से वो गाना है ना "...50-60 की रफ्तार से दौड़ेंगे आशिक़..." तो उसी तरह, एक से एक बड़ी डिग्री लेकर भागते-दौड़ते नज़र आएंगे। कोई संविदा की नौकरी भर चाहता है कोई क्लास फोर बनना चाहता है। वो दिन गए जब आप 'माई एम्बीशन इन लाइफ' में डॉ. या इंजीनियर बनना चाहते थे। अब तो महज़ ये चाहते हैं कि किसी भी तरह, किसी भी तरह की नौकरी लग जाये, नहीं तो खाने के भी  वांदे हो रखे हैं।

 

मेरा एक जानकार है जो इंजीनियरिंग करके मोबायल ठीक करने की गुमटी पर बैठता है । वह अपने आपको 'सेल फोन इंजीनियर' बताता है। जैसे पहले आई . टी. आई. करके लोगबाग अपने आपको रेडियो इंजीनियर और टी.वी. इंजीनियर लिखने लग पड़े थे। पिछले 10-15 साल में डिगरियों का बहुत अवमूल्यन हुआ है। ऐसे समझो सिर्फ नोटबंदी ही नहीं हुई डिग्रीबंदी भी हो गई है। दिल्ली एन. सी. आर. में ही आपको दर्जनों यूनिवर्सिटी मिल जाएंगी। जिनका ज़िंदगी का ध्येय ही आपको डिगरीधारी बनाना है। उनका मिशन स्टेटमेंट है हमारे रहते देश में कोई भी बिना डिग्री नहीं रह पाएगा।

 

अब समस्या डिग्री की नहीं है बल्कि ये है कि पता कैसे लगाएँ कि व्यक्ति जो डिगरियों का पुलिंदा लिए लिए घूम रहा है उसकी असल लियाक़त क्या है ? कितनी है ? अब ये बात तो इम्तिहान से ही पता चल सकती है। वो पेपर लीक हो जाता है सो पता ही नहीं लग पाता। यदि भागा-दौड़ी की कहोगे तो उसमें भी पंगे हैं गुटखा-तंबाकू ने हमें ग़ालिब कहीं का नहीं रखा।

 

 

बेहतर तो ये है कि आदमी गले में किसी पार्टी का पटका लपेट ले और नेता बन जाए। वैसे तो ज़रूरत है नहीं और अगर ज्ररुरत लगे तो एक बंदा साथ रख लें, जो हवा बांधने के काम आयेगा। जैसे इंसान का आई.क्यू. नापते हैं, जैसे ई.क्यू. नापते हैं। वैसे ही एन.क्यू. बोले तो न्यूसेंस कोशेंट नापा जाया करेगा, उसी अनुपात में आपका समाज में दबदबा रहा.करेगा। अत: दंद-फंद लगातार करते रहें। जल्द ही आप इतने ऊंचे उठ जाएँगे आई मीन अपनी न्यूसेंस वेल्यू इतनी (नेट वर्थ) इतनी बढ़ा लें कि आदमी आपकी शिक्षा की, डिग्री की बात ही न करे। जो बात शुरू करे आप वहाँ से दायें बाएँ हो जाएँ और बाद में आधी रात को उसको नींद से उठवा लें। खूब कूटें, इतना कूटें कि वो अपनी डिग्री भूल जाये। फिर उसे हिन्दी में समझा दें '‘हमारी डिग्री - थर्ड डिग्री'’। बस यही आपकी सफलता का कन्वोकेशन है।

 

 

Saturday, May 3, 2025

व्यंग्य : ऑपरेशन बाप-बेटा

 

 

       यह किसी अंग्रेज़ी की फिल्म के प्लॉट सा लगता है। अब तक आपने मेडिकल ग़फलत के अनेक किस्से सुने हैं। दोनों किस्म के आई मीन वाकई गलती वाले और दूसरे जानबूझ कर मरीज़ की और उसके तन-मन-धन की ऐसी तैसी करने वाले। अब लेटैस्ट यह है कि मरीज़ तो बेटा था। ऑपरेशन तो बेटे का होना था। सुबह-सुबह उसे ऑपरेशन थियेटर ले भी गए। ग़रीब पिता बाहर इंतज़ार कर रहा था। तभी अंदर से पुकार लगी "जगदीश कौन है"? अब क्योंकि पिता का नाम जगदीश था वह बोला "हाँ जी मैं हूँ"। वो उसे अंदर ले गए। अब जगदीश सोच रहा है मुझे बेटे ने बुलाया है या फिर डॉक्टर ने कुछ उसे बताना हो। तभी एक अटेंडेंट ने उसको आकर कहा "ये कपड़े बदल लो" और उसे हरे रंग  का गाउन पहना दिया। ये सोच कर कि अस्पताल में चप्पल-जूते उतारने की तमाम किस्म की हिदायतें होतीं हैं। ये भी उनमें से एक होगी ताकि ऑपरेशन थियेटर मे इन्फेक्शन ना आए।

 

अभी उसने गाउन पहना ही था कि अटेंडेंट ने आव देखा ना ताव उसे टेबल पर लिटा दिया और बेहोश कर दिया। वो कुछ कहता इससे पहले उसे बेसुध कर दिया वो गाना है ना:

 

                  दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया

                 हमें आप से भी जुदा कर चले

 

 

    जब बुजुर्गवार को होश आया तब तक उनका  ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो चुका था। लोग उनके स्ट्रेचर पर झुके हुए उन्हें बधाई दे रहे थे। वह किंकर्तव्पविमुण सा सबको देख रहा था और किसी फिल्मी दृश्य की भांति लोगों से पूछ रहा था, नहीं...नहीं ये नहीं कि "मैं कौन हूँ" ? वो तो बस ये जानना चाहता था कि "मैं कहा हूँ" ? जब उसकी बांह देखी गई तो वहाँ कट था और टांके भी लगे हुए थे। सोचने वाली बात ये है कि जब वह पिता एकदम स्वस्थ्य था तो बांह में कट किस बात का लगाया ? ऑपरेशन किस चीज़ का किया गया ? और टांके भी लगा दिये। जब पता चला तो हड़बड़ी मची। तब डॉक्टर ने कहा आप चिंता मत करो हमने ये जिम्मेवारी ली है कि दोनों बाप बेटे को पूर्णतः स्वस्थ्य कर के ही घर भेजेंगे। बस आप इस  बात का किसी से ज़िक्र न करना।

 

 कुछ भी बोलिए मैं इस बात को अस्पताल और डॉ की प्रो-एक्टिव एप्रोच मानता हूँ। डॉ को कैसे भी तो ये पता है कि ये बीमारी आज बेटे में हैं तो कल बाप में भी निकलेगी ही निकलेगी इसीलिए पहले ही प्रेवेंटिव ऑपरेशन कर छोड़ा है। ताकि हो ही ना। पनपे ही ना। बहुत से लोग 'ट्रिगर हैपी' होते हैं। जासूसी फिल्मों की तरह बात बात में ठांए ठांए करने की आदत सी हो जाती है उसी तरह हो सकता है कुछ डॉ 'नाइफ हैपी' होते हों। जहां मरीज़ या मरीज़ सा दिखने वाला व्यक्ति दिखा नहीं कि तुरंत ऑपरेशन टेबल पर लिटाओ और बॉडी चीर के रख दो। किसी ना किसी चीज़ का ऑपरेशन तो कर ही डालेंगे नहीं तो रेडियो टी.वी. की तरह खोलने बंद करने का सर्विस चार्ज लिया जा सकता है। जैसे मकैनिक लोग करते हैं। ऐसी- फ्रिज खोलने का एक चार्ज होता है अगर कुछ खराबी हुई तो उसका चार्ज अलग। मैं सोच रहा हूँ जिस भगवान को पता था कि आदमी ऐसे नहीं मानेगा और ऐनक का आविष्कार कर ही लेगा अतः पैदा करने से पहले ही उसके दायें-बाएँ दो कान लगा दिये ताकि ऐनक उस पर टिका सके, उसी भगवान ने डॉक्टरों की ऐसी जमात देख कर पूरे ज़िस्म पर ज़िप क्यों नहीं लगा दी ?

 

                            जरा ज़िप खोली देख ली तस्वीर-ए-यार

 

Thursday, May 1, 2025

व्यंग्य: जैसी करनी-वैसी भरनी

     

 

     बचपन में हम जब सालाना प्रदर्शनी (नुमाइश) देखने जाते थे या फिर किसी मेले में जाते थे तो एक टेंट में 'जैसी करनी वैसी भरनी' के बैनर/पोस्टर लगे होते थे। इन बैनर/पोस्टर्स में किसी को सींग वाले डरावने दैत्याकार लोग खौलते कढ़ाह में चमचे से हिला रहे हैं। किसी को आग पर भूना जा रहा है। किसी को कोई दैत्यनुमा आदमी कुल्हाड़ी से  काट रहा है या आरे से चीर रहा है। पता चला ये लोगों को बताने को था  आप सदाचार से रहें, कोई चोरी-चकारी, कोई अपराध नहीं करें, कोई पाप न करें नहीं तो ऊपर जाकर आपके लिये नरक में इसी किस्म की यातनाएं आरक्षित हैं। यह कुछ इसी तरह का था जैसे बचपन में हमें हमारे बुजुर्ग कहते थे  झूठ मत बोला करो नहीं तो कान पक जाएँगे। या फिर झूठ बोले कौवा काटे।

 

     हम लोग जानते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है। ना तो झूठ बोलने से कौवा काटता है ना ही कान पकते हैं और तो और ये कढ़ाही वाली बात भी मुझे  झूठ ही लगती है, मगर वो तो मरने के बाद नरक जाने पर ही पता चले। इसका 'सोबरिंग' प्रभाव ये पड़ता था कि लोग बाग एक बार को तो सोचेंगे "यार ! कहीं कढ़ाही में डालने वाले तैयार न बैठे हों और बैठे बैठे सब हिसाब लगा रखा हो”।

 

 

नेता जी ने कहा है कि ये जो आतंकवादी हैं ना इनको इनकी कल्पना से भी ज्यादा बड़ी सज़ा मिलेगी। इनकी रूह काँप जाएगी वगैरा वगैरा। धीरे-धीरे वक़्त बीतता गया। नेता जी ने सोचा लोग भूल जाएँगे। पब्लिक मेमोरी कमजोर होती है। उसकी उम्र सिर्फ दूसरी घटना तक की होती है। मेरे एक मित्र थे उनको ये ताज्जुब होता था कि मुझको इतने जोक्स कैसे याद रहते हैं। उनका कहना था कि उनकी मेमोरी जोक्स के मामले में केवल एक जोक तक सीमित है। जैसी ही कोई नया जोक सुनते हैं, पुराना भूल जाते हैं।

 

 

कुछ यही हाल पब्लिक मेमोरी का है। जब बहुत दिनों तक कोई घटना नहीं हुई तो पब्लिक मेमोरी में पिछली वाली घटना रह-रह कर कौंधने लगी। इस को चैनलवाले, यू ट्यूब वाले और विपक्ष ले उड़ा और बार-बार यही सवाल दिन-रात करने लगा। आजकल पुरानी क्लिप चला-चला कर अलग पागल किये रहते हैं। इसी से नेता जी को ख्याल आ गया! क्या बोलते हैं आइडिया आया। उन्होने तुरंत से पहले प्रैस काॅन्फरेंस कर के देशवासियों को बताया मैंने कहा था इनको सज़ा मिलेगी, इनकी कल्पना से भी ज्यादा भयावह सज़ा मिलेगी। मैं आज भी अपने बयान पर कायम हूं। इसमें मैंने ये कब कहा कि ये सज़ा हम देंगे ? हम सज़ा देने वाले कौन होते हैं? सज़ा देने वाला तो वो सबका मालिक ऊपरवाला है। भगवान बोलो, श्रीराम बोलो, हनुमान बोलो भले आप फिर अल्लाह ही क्यों ना बोलो। हम ऊपरवाले के काम में दखल देने वाले कौन हैं ? क्या ये हमें शोभा देता है? हम युद्ध नहीं बुद्ध के देश वाले हैं।

 

व्यंग्य: ऑपरेशन-ऑपरेशन


 

      बचपन में हम लोग डॉक्टर-डॉक्टर खेलते थे। जितने भी बच्चे डॉक्टर-डॉक्टर खेलते थे उनमें से कोई भी बड़े होकर डॉक्टर नहीं बन पाया। अलबत्ता मरीज हर एक बन गया। रामायण और महाभारत सीरियल में बात-बात में पात्रों का आशीर्वाद देने का चलन था। आशीर्वाद भी ऐसा-वैसा नहीं बल्कि सीधा आयुष्मान भव: वाला। इसी से प्रेरित होकर सरकार ने अपनी स्वास्थ्य योजना का नामकरण आयुष्मान भारत रख छोड़ा। अब जिसे देखो आयुष्मान भव: का कार्ड लिए लिए अस्पताल-अस्पताल चक्कर लगा रहा है। अस्पतालों ने इनके लिए अलग ही काउंटर बना दिया है ताकि सांभ्रांत मरीजों के इलाज में व्यवधान ना पहुंचे।

 

 

       इसी श्रंखला में अस्पताल वाले अब अपने विज्ञापनों में बड़े-बड़े अक्षारों में लिखने लग गए हैं कि हमारे यहाँ आयुष्मान योजना के अंतर्गत इलाज किया जाता है। ज़ाहिर है इसके लिए उन्हें सरकार से ग्रांट मिलती होगी। इसी सीरीज में वो आए दिन कैंप का आयोजन करते रहते हैं। कैंप में भावी मरीज पकड़ने में आसानी होती है। उन्हें समुचित तौर पर बीमारी के भयावह होने का डर दिखाया जा सकता है अथवा उनकी बीमारी के बारे में बढ़ चढ़ कर बताया का सकता है। ताकि आयुष्मान के साथ साथ कुछ धन लाभ भी हो सके। दूसरे शब्दों में आयुष्मान भव: यदि बिल पे भव:।

 

 

      एक कस्बे के अस्पताल में इस योजना के अंतर्गत आँखों की जांच के कैंप आयोजित किए गए। इस तरह के कैंपों में भी भावी पेमेंट वाले मरीज चिन्हित करने में मदद मिलती है। एक मरीज जो अपने मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए दाखिल हुआ तो उसे जब छुट्टी दी गई तो उसने देखा कि डॉक्टर साब ने मोतियाबिंद तो दायीं आँख में बताया था और उसने शिकायत भी दायीं आँख से कम दिखने की की थी मगर ये क्या पट्टी बाईं आँख में बंधी है। वह दौड़ा-दौड़ा अपने किसी पहचान वाले डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर ने आँख की जांच कर बताया कि उसकी आँख ठीक है और जिस आँख में पट्टी बंधी है अर्थात जिस आँख का ऑपरेशन होना बताया गया था उसमें भी केवल आई ड्रॉप डाली गई है। जाओ ऑपरेशन सफलता से सम्पन्न हुआ। ये दाया बायाँ वाला चक्कर नहीं होता तो मरीज को पता भी नहीं चलता कि आँख का कोई ऑपरेशन- वापरेशन नहीं हुआ है बस आई ड्रॉप और पट्टी का खर्चा ही किया है अस्पताल ने।

 

अब आपको समझ आया। कोई भी कैसी भी बेहतर से बेहतर योजना आप ले आयें, लागू होने के स्तर पर उसमें भाई लोग दायें-बाएँ कर ही लेते हैं। अब युवकों के पास रोजगार है नहीं, ऐसे में आखिर बेचारे उन लोगों को भी तो आयुष्मान रहना है।

 

 

Tuesday, April 29, 2025

व्यंग्य: पनीर और शादी का भोज

 


 

      खबर है कि वाराणसी में एक शादी के भोज में जब पनीर की सब्जी परोसी गई तो सब्ज़ी में पनीर न पाकर युवक को इतना क्रोध आया कि उसने शादी के शामियाने में अपनी मिनी वैन घुसा दी और छह लोगों को रौंद दिया। बेहतर रहता कि वह इन लोगों को पनीर की सब्ज़ी की रेसिपी बताता। यह तो वही बात हो गई कि कल को शिमला मिर्च की सब्ज़ी में शिमला न मिले तो कोई अपना ट्रक घरातियों पर चढ़ा दे। जिन पर मिनी वैन चढ़ी है वो तो मुझे लगता नहीं ज़िंदगी में कभी पनीर की सब्ज़ी खाएँगे।

 

शादी-ब्याह का यही रोना होता है। आप नॉन-वैज की टेबल पर देखो कैसे लोग चमचे को अंदर-अंदर डुबकियां लगवा कर देखते हैं कि कहीं कोई लैग पीस मिल जाये। ‘वी दि नॉन वैज पीपुल ऑफ इंडिया’ लैग-पीस के दीवाने हैं। गोया कि अगर लैग पीस नहीं मिला तो ब्याह पक्ष की टांग उखाड़ देंगे। चलो! चिकन तो महंगा मिलता है। कितना ही फार्म का और नकली चिकन केमीकल वाला ले आओ, आता महंगा ही है। पनीर के साथ तो ऐसा नहीं होना चाहिए। कारण कि आजकल तो इतना नकली पनीर चल गया है। ऐसा पनीर ही तो शादी ब्याह में बहुत बड़ी मात्रा में खपता है। ऐसा पनीर बैंकेट हॉल और होटल में खूब चलता है। फिर भी कम पड़ गया? कमाल है !

 

एक बात है यह घटना एक तरह से उदाहरण के तौर पर लोग बताया करेंगे खासकर शादियों में “भैया ! पनीर की सब्ज़ी में पनीर जरा ठीक-ठाक लाना नहीं तो याद है ना वो बनारसै वाला हाल करेंगे।“ कई मनचले तो यह भी कहेंगे "बनारस वाली घटना फीकी पड़ जाएगी वो हाल करेंगे"। ऐसा कहते हैं शादी-ब्याह में रूठना-मनाना, छोटी-मोटी लड़ाई आम बात है। शायद यह एक तरह का शगुन होता हो। कारण कि लड़ाई, क्या युद्ध के सब उपकरण तो मौज़ूद ही रहते हैं, क्या घोड़ी, क्या सवार, क्या लूट का माल, क्या तलवार, क्या अस्सलाह, भले हर्ष फायरिंग के लिए सही।

 

सोचने वाली बात ये है कि शादी में सब ये ही क्यूँ चाहते हैं कि खातिरदारी ऐसी हो कि बस भूतो न भविष्यति। इस दिशा में लोगबाग कोई कसर भी नहीं छोड़ते। आजकल तो शादी एक, और भोज दस-दस। कभी लेडिस-संगीत के नाम पर, कभी कॉकटेल के नाम पर, कभी रिशेप्शन के नाम पर। अब कोई कहाँ तक पनीर लाये। गेस्ट लोगों ने तो पनीर में पनीर ढूँढना ही है। वो भी तो कोई न कोई बहाना ढूंढ रहे होते हैं। कहते होंगे अपने ड्राइवर, अपने क्लीनर को "तू गाड़ी, मिनी वैन स्टार्ट करके रखना मैं जरा पनीर की सब्जी देख कर आता हूँ, पनीर होगा तब तो ठीक है नहीं तो मैं इशारा करूंगा तू चढ़ा देना ऊपर"।