Ravi ki duniya
Wednesday, January 16, 2013
Friday, January 4, 2013
व्यंग्य : कलियुग का स्थापना काल
विद्वानों में कलियुग के स्थापना काल तथा पृथ्वी के किस भू-भाग पर इसका सर्वप्रथम आगमन हुआ इसे ले कर मतभेद हैं लेकिन पिछले दिनों की घटनाओं से स्थिति साफ़ हुई है और भारत नामक देश बार बार चर्चा में आया है
प्राचीन समय की बात है भारत वर्ष में एक नगर था दिल्ली. यह नगर सुदूर पूर्व में अपनी रुपहली छटा के लिए जाना जाता था. एक के बाद एक राजा इस नगर को ही अपनी राजधानी बनाते रहे थे. वहाँ के बृहद राज मार्ग तथा राजमार्ग के दोनों ओर घने छायादार वृक्ष थे. महल के तथा राजा के अनेकानेक व्यस्त कार्यालयों के व्यस्ततम कर्मचारी वहाँ केलि-क्रीडा करते न थकते थे. वे अनेकानेक इंडोर गेम्स को आउट डोर में खेला करते थे. इसके अलावा प्रेमी-जन पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेम का राग अलापते थे. साथ साथ जीने मरने की झूठी शपथ लेते और छल प्रपंच रचते थे. स्थान स्थान पर फुव्वारों की रंगीन आभा देखते ही बनती थी. यद्यपि राज्य में जल का, विशेषकर पेय जल का अभाव था. प्रजा को पेय जल सुलभ नहीं था. यद्यपि तब तक सुलभ शौचालय आ गए थे. इतिहासकार ऐसी पुष्टि करते हैं. राजधानी की रंगीनियां देखते ही बनती थीं. बड़े बड़े राजमहल, धनाढ्य और राज सभा के सभासद अपने अपने भव्य विशाल भवनों में विश्राम करते थे. एक समय ऐसा आया कि अधिकतर सभासद और राजा विश्राम तंद्रा में ही लीन पाये जाते थे. और जब तब तंद्रा टूटती भी तो वे इस जोड़ तोड़ और युक्ति में व्यस्त रहते कि कम से कम समय में कैसे अधिक से अधिक धन संग्रह किया जाये. विशाल आकार की उद्घघाटन पट्टिकाओं के अवशेष सर्वत्र खुदाई में मिले हैं. विदेशों में धन सुरक्षित रहेगा इस लालसा में लोगों के स्विट्ज़रलैंड नामक देश में अनेक छद्म नामों से खाते / संदूकची पाईं गयीं हैं.
यहीं से भारत वर्ष के पतन के युग का सूत्रपात बताते हैं. लोक लुभावन सार्वजनिक वक्तव्य प्रचुर मात्रा में दिये जाते थे. सभी राजनैतिक दलों में एक चिरन्तन होढ़ लगी रहती थी की अपने अपने ‘वस्तु नृत्य’ ( आइटम डांस) से कौन अधिक से अधिक मतदाताओं को रिझा सकता है. मतदाता भी कम चतुर न थे. एक से मदिरा लेते, दूसरे से कंबल, तीसरे से स्वर्ण मुद्रा. तथा मतदान दिवस पर अपना मत किसी चौथे व्यक्ति को दे आते थे और इस प्रकार बाकी तीनों का चौथा सम्पन्न कर दिया करते थे.
बुद्धिजीवी वर्ग की भरमार थी. वे टिड्डी दल की भाँति शहर-शहर, नुक्कड़-नुक्कड़, चैनल- चैनल मंडराया करते थे. वे सदैव मुद्दों की जुगाली करते पाये जाते. वे एक नए काल्पनिक संसार की संरचना में व्यस्त रहते. उन्हें अपने परिवेश से, अपने राजा से, अपने राज्य से यहाँ तक कि अपने आप से वैराग्य था. ये वैराग्य इस सीमा तक पहुँच चुका था कि वे इनके अस्तित्व के साथ साथ अपने अस्तित्व को भी घोर निंदा से देखते.
समाज में समाचार पत्र के पृष्ठ तृतीय पर अपने चित्र देखने दिखाने की एक गला काट प्रतियोगिता सी निकल पड़ी थी. अक्सर इस पृष्ठ पर स्थान पाने के लिए माताएँ बहनें अल्पतम परिधान में रहतीं थीं. बल्कि परिधान रहित होने को भी तत्पर थीं. इस युग में एक विधा चलचित्र की भी अपनी भरपूर तरुणाई में थी. उसमें विभिन्न प्रकार की त्वचा विशषज्ञ अपनी अपनी त्वचा का सार्वजनिक तौर पर दिग्दर्शन-प्रदर्शन कर भूरि-भूरि प्रशंसा बटोरती थीं. इसके लिए जो भाव-भंगिमायेँ वे अपनाती थीं तथा गीतों के जो शब्दांश मिले हैं उससे ज्ञात होता है कि चोली, स्कर्ट, सैयां, गोरी, कांटा, चमेली, बिजली, फेविकोल, झँडू बाम, फायर ब्रिगेड आदि विशेष आयोजन और प्रयोजन की वस्तुएं थीं.
शनै शनै एक ऐसे संक्रमण काल से यह राज्य गुजरा जहाँ स्त्री को देखने मात्र से जन साधारण में कुछ ऐसे कीटाणुओं का संचार होता था कि वे बलात उस से संबंध बनाना चाहते थे. इस में चल-दूरभाष (मोबाइल) की और संगणक अंतर्जाल ( इंटरनेट ) जैसे उपकरणों को विशेष दूत की सी भूमिका में हम पाते हैं.
इस दिशा में प्रजा तेज़ाब डालने से ले कर बलात उठा ले जाने तथा घर में घुस कर संबंध बनाया करते थे. सुनसान स्थान की अपेक्षा भीड़-भाड़ वाले स्थानों, राजमार्गों और श्याम वर्ण काँच की खिड़कियों सज्जित वाहनों निजी तथा सार्वजनिक दोनों का व्यापक उपयोग होने लगा था. अपराधी अपराध करके अपनी रक्षा हेतु स्वयं ही प्रहरी की शरण में चले जाते थे. प्रहरी ही अपनी विलक्षण प्रतिभा से उन्हें एक ही समय में दूसरे स्थान पर दिखने के गुरु मंत्र बता देते थे. वे उन तिलिस्मी क्रियाओं में पारंगत थे जिनमें मृतक को जीवित तथा जीवित को मृत आसानी से घोषित किया जा सकता था. इस मायाजाल के अनेकानेक लाभ थे. किन्तु वे वर्तमान अनुसंधान का विषय नहीं.
प्रहरी, चिकित्सक तथा विधिकों की ऐसी प्रगाढ़ तिकड़ी थी की इस के आगे टिक नहीं पाती थी-- चालाकी हो या ईमानदारी. ये तीनों मिल कर तीन लोक से न्यारे लोक की रचना में सक्षम थे अर्थात इस लोक के वास्तविक विश्वकर्मा थे वे.
एक समय ऐसा आया कि आर्यवर्त रसातल की ओर द्रुतगति से अग्रसर होने लगा. प्रजा त्राहि त्राहि कर रही थी. राजा, रानी, युवराज, मंत्री, महामंत्री, सभासद सभी व्यस्त थे तथा दो के कैसे बाईस बनायें जाएँ इस जुगत में रात दिन लिप्त रहते थे. इस पूर्णकालिक गतिविधि से जैसे ही विश्राम के दो पल मिलते उसमें पुनः वे व्यस्त हो जाते की जन साधारण को किस विधि से अपने पक्ष में मतदान कराया जाये. मतगणना की कौन सी पद्धति अपनाई जाये तथा किस निर्वाचन क्षेत्र से किस जाति विशेष व धर्म विशेष के प्यादे को पदाया जाये
इस सब के उपरांत जैसे ही विश्रांति आती वे विदेशगमन अथवा राग विलास में डूब जाते. यह एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई थी. राजकीय वर्ग हो या कुलीन वर्ग सभी लीन थे. ‘सामाजिक मूल्य’ यह वाक्य अपनी अस्मिता खो चुका था. सभी धन लिप्सा में बौराए बौराये अनवरत गहरे गर्त में गिरते जा रहे थे. किन्तु वे सभी प्रसन्न थे. असंतोष और चिंता थी तो मात्र एक--- उनका बुद्धिहीन पड़ोसी अथवा पड़ोसी से भी अधिक बुद्धिहीन सगे- संबंधी इस स्पर्धा में कहीं उनसे आगे न निकल जाएँ.
इस अंतहीन स्पर्धा में राजकीय वर्ग राजनर्तकी की तरह राजकृपा पाने को किसी भी सीमा तक जाने को आतुर था. कोई सीमा थी ही नहीं. सीमा बंधन है. सीमा क्या है ? आपके पंखों को उड़ान न भरने देने का भारी पत्थर है. अतः सभासद इसे भालिभांति समझ कर आत्मसात कर चुके थे. नित नये स्वांग मंडी में आते थे. जिसमें पैसे दुगना-चौगुना करने से लेकर साथी सेवा (एस्कौर्ट सर्विस ) ए टू ज़ेड मसाज सेवा सम्मिलित थी. यद्यपि ज़ेड तक कोई कोई विरले ही पहुँच पाते थे. अधिकतर तो ई.एफ.जी. तक आते आते अपनी सम्पति, सम्मान, और स्वास्थ्य तीनों से वंचित हो जाते थे.
जैसा कि ऊपर उल्लेख आया है इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र के साथ साथ पी.पी.पी. के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र की भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी थी. अतः निजी वाहनों में अबलाओं के साथ बल प्रयोग अब सार्वजनिक वाहनों में भी आ गया था और उसके वाहक, संवाहक तथा अन्य कर्मी इसमें अपने तुच्छ जीवन की परवाह न करते हुए कूद पड़े थे. ऐसी ही एक घटना थी जो 16 दिसम्बर सन 2012 को आर्यवर्त के दिल्ली नगर में घटी थी. और उसी से ‘कलियुग’ की पूर्णतः स्थापना मानी गई है. तभी से आर्यवर्त अनार्यवर्त कहलाया, भारत भार हो गया. और मानव दानव का अन्तर समाप्त हो गया.
Sunday, December 9, 2012
सच्ची हॉरर कहानी:
अलीगढ़ के पास एक गाँव से लौटते हुए रात को बिना किसी लाईट, खेतों से चाँद की मद्धम रोशनी में गुजरते हुए उसी गाँव के
निवासी करनसिंह ने यह किस्सा बताया था. “ रवि बाबू जरा जल्दी जल्दी पाँव बढ़ा लो यह
खेत से अगले दो खेत तक जरा प्रॉब्लम है” मेरे पूछने पर वह टाल गया. मैंने फिर पूछा
क्या है..बार-बार पूछने पर उसने कहा कुछ साल हुए यहां से हमारे गांव का एक आदमी रात
को गुजर रहा था कि अचानक वह किसी पेड़ के नीचे पेशाब करने को रुका. उसके बाद वो अभी
थोड़ी दूर ही गया था कि उसे एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी. उसने सोचा खेत
पर पहरेदारी के लिये सोते हुए किसान के किसी बच्चे के रोने की आवाज होगी. पर तभी उसे
याद आया कि इस खेत का मालिक किसान रामसरन तो दो साल पहले फांसी लगा कर मर चुका है.
वह आगे बढ़ता रहा क्यों कि ग़ाँव के बुजुर्गों से उसने सुना था कि रात को खेत से जाते
हुए कोई पीछे से आवाज दे तो चाहे कुछ भी हो
जाये पीछे मुड़ कर मत देखना. और कोई रास्ता पूछे या कोई पता पूछे तो भले बता
देना मगर हरगिज़ हरगिज़ उसकी आंखों और पाँव की तरफ मत देखना. वो कितना भी कहे सुनो..देखो..तुम
अपनी राह लेना.
यह याद कर वह अय्र तेज़ तेज़ कदम बढ़ाने लगा.. मगर बच्चे की आवाज
और नज़दीक आती जा रही थी. एक बार को तो उसे लगा कि जैसे वह बच्चा उसके साथ ही चल रहा
हो जैसे.
तभी अचानक उसने देखा कि पगडंडी के किनारे केले के पत्ते पर बच्चा
लेटा हुआ है और जोर जोर से रो रहा है और हाथ-पाँव मार रहा है. उसने आवाज भी लगाई अरे
भाई ये किसका बच्चा रो रहा है..कोई है..उसने सोचा हो सकता है कोई शौच आदि के लिये यहां
आस-पास बैठा हो तो कमसेकम आवाज तो लगा ही देगा. मगर उसकी आवाज लौट कर उसी के पास आ गयी...और वो आगे बढ़ गया. मगर आवाज और भी तेज़ हो
गयी. उसका मन नहीं माना और वो जैसे ही उसने रुक कर पीछे मुड़ कर देखा तो दंग रह गया
जैसे बच्चा उसके साथ साथ ही आ रहा था कारण कि वह केले का पत्ता नज़दीक आ गया था. उसने
सोचा रात में उसे ठीक से दिखा नहीं होगा. ऐसा कैसे हो सकता है. और उसने आव देखा न ताव
और बच्चे को गोद में उठा लिय. गोद में उठाते ही बच्चा चुप हो गया और बिना बात मुस्काराने
लगा. एक हाथ मैं अपना बैग और एक हाथ में बच्चे के थामे वह लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ
चलने लगा.
न जाने क्यूं उसे ऐसा लगा कि बच्चा जैसे भारी सा हो गया है.
उसने सोचा उसके मन का वहम होगा. और वह अपनी रफ्तार से चलने लगा. लेकिन अभी थोड़ी दूर
ही गया होगा कि ऐसी सर्दी में भी उसे पसीने आने लगे. उसने सोचा ऐसा कैसे हो सकता है.
तभी उसने महसूस किया कि बच्चा और भी अधिक भारी हो गया है ... उसने बच्चे को ठीक-ठाक
से अपनी गोद में ‘एड्जस्ट’ करने के लिये जैसे ही थोड़ा ऊपर को सरकाया वह दंग रह गया. बच्चा
टस से मस नहीं हुआ. उसने जैसे ही नीचे देखा तो उसकी घिग्घी बंध गयी. वह देखता है कि
बच्चे के पाँव लटक कर लगभग ज़मीन को छूने वाले थे. वह एक दम घबरा गया और इसी घबराहट
नर्वसनैस में बच्चा उससे गिर गया या फिर उसने ही घबरा के अथवा डर के मारे बच्चे को
एक दम अपनी गोद से नीचे गिरा दिया....
नीचे गिरने से पहले बच्चा जोर जोर से हँसा और उसकी हँसी एकदम
बड़े आदमी की हँसी थी वो बच्चे की हँसी कतई नहीं थी. गिरते-गिरते बच्चे ने कहा “ आज
तो बच गया तू.. बस अगर मेरे पाँव ज़मीन पर लग जाते तो तेरी मौत तय थी आज की रात...हा..हा..ह..हा.ह.हा....हाअ.हा
और यह कह वह गायब हो गया.
Wednesday, November 28, 2012
HUMOUR - WHY DID CHICKEN CROSS THE TRACK ?
1. ACM Our entire traffic of ‘smalls’ has already
gone to roads
2. AOM Came to know through control message, have
already set up FOIS (Fowl Operations Information Service)
3. APO File is put up. In the meanwhile chicken
crossed the track without NOC. It is a ‘Cross’ item
4. AME With no incentive scheme and bad pit line
the chicken could not have done better.
5. ASC It is a clear cut case of RPUP Act
(Rooster Possessed by Ultra Powers)
6. ASTE Chickens are not entitled for CUG as per
Rules. No spare pair is available
7. AMM Quality of track and reasonability of rate
has to be certified by the chicken
8. AEN It was a case of rail fracture and APWI is
responsible. However inquiry will reveal it was Signal dept‘s failure
9. ADMO He was under ‘sick’ and did not apply for
‘change of air’ to the hospital of his jurisdiction.
10. AFA His proposal for crossing the track was
returned unvetted for want of detail justification
11. AVO Give a questionnaire to chicken, confiscate
all files and papers in original pertaining to both chicken and track and then wait for CVC’s II stage advice. Till then chicken will be in Agreed List
12. AEE This side of track could not take the load
so panto dropped. He should have applied for three phase extra meter
13. PRO i. Thank you very much for your suggestion
ii. Complaint will be looked into
iii Inconvenience caused is highly regretted
14. AHO The road signs were not bilingual as per
dhara 3 (iii)
Saturday, October 20, 2012
व्यंग्य : सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता
सरकार भी कभी-कभी अच्छे मूड में होती है. अर्थात हल्के-फुल्के मज़ाक के मूड में. अब यहीं देख लीजिये ‘सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता’ भई वाह ! जैसे कि पहले नहीं थी क्या ? भाई साहब सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता भी है, दूरदर्शिता भी है. भाईचारा भी है ( चारा शब्द पर जोर है ) सौहार्द भी है समृद्धि भी है. बरकत भी है. मैं एक बार एक फर्नीचर की दूकान पर गया मैंने चेयर का भाव पूछा तो उसने मुझसे पूछा “ आपको घर के लिये चाहिये या ऑफिस के लिये” अर्थात दोनों के रेट अलग-अलग हैं. एक ज़माने में सरकारी सुपर बाज़ार और केंद्रीय भंडार की खरीद की बड़ी मान्यता थी. वहीं के सेल्समैन आपको अपनी ‘पैट’ चाँदनी चौक. करोल बाग़ या लाजपत नगर की दूकान का पता दे देते थे. धीरे से यह भी बता देते थे कि आप फिक़र ना करें रसीद सुपर बाज़ार / केंद्रीय भंडार की ही मिलेगी.
सार्वजनिक दफ्तरों में एक बात
क़तई बर्दाश्त नहीं की जाती कि एक अकेला आदमी खाता फिरे और खा-खा कर अपनी सेहत
बिगाड़ ले और बाकी सूखाग्रस्त इलाके के मवेशियों की तरह इधर-उधर सूंघते फिरें. अत:
वहां कमेटियां बना दी गयीं हैं. तरह तरह की रंग-बिरंगी कमेटियां. लोकल परचेज़ कमेटी, स्पॉट परचेज़ कमेटी,
एक लाख वाली कमेटी, एक करोड़ वाली कमेटी. इससे हौंसला, हिम्मत और हठ बनी रहती है. कमेटी बनाने के पीछे यही नीयत और नीति काम
करती है. जितनी पारदर्शिता सरकारी कामकाज और सार्वजनिक खरीद में है, उतनी तो आपके
हमारे घर में भी नहीं. सबको पता होता है कि दो परसेंट देना है या दस परसेंट. किसे
देना है और कहां देना है. आप तो वैट अब लाये हैं हमारे यहां वैट न जाने कब से है.
हम इसे वेट कहते हैं. वेट यानि वज़न. पारदर्शिता है. बरोबर है. आर.टी.आई.
क्या है ? पारदर्शिता है.
नौकरशाही आर.टी.आई नामक बिकिनी
पहनकर इठलाती हुई रैम्प वॉक कर रही है. कहते हैं जिससे खरीदना है उसे एल-1 क्यों
कहते हैं. आप नासमझ हैं अगर कहें कि एल-1 का अर्थ ‘लोएस्ट-1’ होता है. सच तो ये है इसका अर्थ है ‘लाओ नम्बर-1’ अर्थात हमनें इतने सारों में से तुमको
चुना है. आओ मेरे प्यारे ! ‘लाओ नम्बर-1’
सार्वजनिक खरीद में जो रक़म
ली-दी जाती है उसका मुहावरा कुछ भी हो—अंडर दि टेबल, गुड्विल मनी,
गुडलक मनी, बच्चों के लिये मिठाई, भाभी
जी के लिये भेंट, ‘अर्थ’ एक ही होता है. आजकल उसे यह कह कर जस्टीफाई किया जाता है कि यह तो आपकी वित्तीय
क्षमता जानने का जरिया भर है. वित्तीय
कंडीशन जानने का तरीका मात्र है. फर्ज़ करो आपको गैस एजेंसी लेनी है या पेट्रोल
पम्प लेना है तो जो भी आप पहले देंगे उसी से तो यह पता चलेगा कि पार्टी
फाइनेंशियली कितनी साउंड है. पेट्रोल पम्प चला भी पायेगी या नहीं. कहीं घसखोदों को
तो नहीं गैस एजेंसी दे दिये. या कहीं टटपूंजियों को तो नहीं एल-1 कर दिया जो किसी
के भी काम न आ सकें और काम भी न हो. फिर जनता ने ही शोर मचा देना है और कहते-फिरना
है कि पैसे खा लिये,पैसे खा लिये.
मैंने एक बार अपने दफ्तर में
स्टॉक रजिस्टर मंगाया तो पता चला कि एक वैक्यूम क्लीनर भी है. मैंने कहा लाओ भई और
कारपेट साफ करो. जो वो ले कर
आया उसे देख कर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया. आपको याद है न पहले बर्तनों पर कलई
करने वाले एक धौंकनी सी साथ ले कर चला करते थे. बस वही थी और वह बोला “ सर मेरे पास तो ये ही है” तो यह है कहानी सरकारी
दफ्तर की. दफ्तर के गोदाम में पड़ा तख्त, कैसे पहले तख्ता और
फिर तख्ती बन जाता है. एक पुस्तक खरीद में मैं भी एक कमेटी का सदस्य बन दूसरे शहर गया.
( कमेटी अक्सर दूसरे शहर जाती है ताकि लोग पहचान न पायें) मेरे साथ जो दो सदस्य थे
उनका पुस्तकों से वही नाता था जो फैशन-मॉडल का वस्त्रों से. लेकिन वे कमेटी के
सम्मानित सदस्य थे और अपने अपने विभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. देखते देखते
उन्होने मँहगी से मँहगी डिक्शनरी अपने लिये ‘उपहारस्वरूप’ कबाड़ ही लीं.
मेरा हैदराबाद का एक मित्र
अक्सर अपनी दवाई की कम्पनी के काम से दिल्ली सरकारी दफ्तर में दवाई की सरकारी खरीद
के लिये आया-जाया करता था. एक जरूरी मीटिंग के लिये एक बार जब वो आया तो रिशेपशन
के लोगों ने उसे घुसने ही नहीं दिया. लाइन में आओ. हमें जब आपके बुलाने के आदेश
आयेंगे हम तो तभी आपको छोड़ पायेंगे. अब आपके लिये हम अपनी सरकारी नौकरी तो दाँव पर
नहीं लगायेंगे. आपका क्या आप तो प्राइवेट में हैं. फिर बात करते करते आप क्या
बनाते हो ? जब उसने कहा दवाई, तो उनका उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ा और बोले अगली बार हमारे लिये टॉनिक, विटामिन की दवाई और गिफ्ट ले कर आना तभी पास बनेगा. इस बार तो छोड़ रहे हैं.
उनका कहना था कि आप ऊपर तो इतने लाखों रुपये दे देते हो और ये ग़रीब स्वागतकक्ष के
दक्ष कर्मचारी आपको दिखते ही नहीं. इतना भी ऊपर मत उड़ो. कुछ तो भूतल वालों का भी
ख्याल करो.
सार्वजनिक खरीद के माध्यम से
समझो आपको सोफा खरीदना है. तो जब वो सोफा आपके चैम्बर में आयेगा तो आप कनफ्यूज हो
जायेंगे कि इसे सोफा कहते हैं ? इसे
सोफा क्यों कहते हैं ? और अगर ये सोफा है तो सोफे को सोफा
क्यों कहते हैं ? . सार्वजनिक खरीद वाले बड़े ही स्मार्ट, दिमाग वाले, चुस्त फुर्तीले होते हैं. उन्हें सब
पता होता है. वे के.बी.सी. से बहुत पहले के के.बी.सी. हैं (कब बनेंगे करोड़पति). गज़ब की जनरल
नॉलिज होती है उनकी. कहां से क्या क्या मिलेगा. मार्किट सर्वे उनकी फिंगर टिप्स पर
होता है. कैसे एक ही वेंडर से तीन और कपोल-कल्पित कम्पनियों के लैटरहैड पर कोटेशन
लेनी है. जिसमें फोन न. अलग हो, पते अलग हों, स्याही-पैन अलग हों. जिस लैवल की खरीद
उतनी ही पारदर्शिता रखी जाती है. साफ चमचमाती पारदर्शिता. कोल्ड ड्रिंक, ड्राई फ्रूट से शुरु हो कर इलेक्ट्रोनिक आइटम्स,
विदेशी शराब, विदेश सैर, एयर टिकट, स्विस बैंक. हरि अनंत..हरि कथा अनंता की तर्ज़ पर पारदर्शिता अनंत..
पारदर्शिता अनंता और सिर्फ पारदर्शिता ही क्यों दूरदर्शिता अनंता. पहले दिल्ली का
अशोक होटल ‘रैड स्टोन’ का था. लालकिले
के माफिक. फिर एक प्रबंध निदेशक महोदय आये उन्हें लगा कि रैड स्टोन मुग़ल काल की
याद दिलाता है. मुग़ल काल क्या था ? हमारी दासता, हमारी पराधीनता का काल था. विदेशी आताताईयों का काल था. अत: उन्होंने
फौरन आदेश दे कर उसे सफेद पेंट करा दिया. इसे कहते हैं दूरदर्शिता. अब सफेद है तो
जल्दी जल्दी गंदा भी होगा. गंदा होगा तो साल दर साल इतने बड़े होटल को सफेद पेंट
करा देने मात्र से न जाने कितने प्रबंध निदेशकों की काली कमाई का प्रबंध हो गया.
हमारे एक अफसर की पत्नी का
कहना था वह पहनना तो बहुत चाहती हैं मगर गोल्ड जूलरी उन्हें सूट नहीं करती है.
हमारी फैमिली पर ‘कर्स’ है अत: भैया ! लानी हो तो डायमंड जूलरी ही लाईये. और वो पसंद करने शो रूम
भी जातीं थीं. वहीं पसंद करके चली आतीं थीं बाकी पचड़े सार्वजनिक खरीद... नहीं.. खरीद
नहीं.. सार्वजनिक फरोख्त वाला निपटाता था. आपने देखी सुनी है कहीं इतनी पारदर्शिता.
मेरा मानना ये है कि सार्वजनिक खरीद में और अधिक पारदर्शिता लाने के लिये हर विभाग
को एक हैंड बुक, एक गाइड हर साल डायरी की तरह निकालनी चाहिये.
जिसमें सब तफसील से दिया गया हो. पेंसिल से ले कर प्लेन तक. नाम-पते हों. किसके लिये
किससे मिलना है. और अगला कहां मिलेगा. अगले का क्या रेट है और उस पर कितना डिस्काउंट
बगैर हील-हुज़्ज़त के वह कर देगा. फोन न. ई. मेल, पर्सनल मोबाइल
न. और इस कूपन को साथ लाने वाले को एडीशनल 5 % की छूट.
ये टेंडर का डर किसे दिखाते हो
जी. अभी दुनाली सर पर रख दी या कट्टा कनपटी पर लगा दिया तो सारी ईमानदारी का वाष्पीकरण
हो जायेगा. रह जायेगा दूध का दूध पानी का पानी. पानी तो पारदर्शी होता ही है. आखिर
रहीम ने भी कहा है “ रहिमन पानी राखिये...”
आप यक़ीन करें या न करें मेरा दावा
है कि सार्वजनिक खरीद में हमारे देश में जितनी पारदर्शिता है अन्य किसी तथाकथित उन्नत
देश में भी नहीं.
दरअसल अगर हम इस से ज्यादा पारदर्शिता
लायेंगे तो क़ानून हमें नग्नता फैलाने के आरोप में अंदर कर देगा.
Sunday, July 15, 2012
अदभुत किंतु सत्य
एक व्यक्ति राम प्रसाद
(बदला हुआ नाम) अपनी मां को हरिद्वार तीर्थ कराने ले गया. मां को गंगा किनारे एक जगह
बैठा कर वह कुछ लेने गया. लौट कर देखा तो मां नहीं थी. बहुत ढूंढा मां न मिली. क्या
करता, भारी मन से गांव आ वापिस आ गया. पूरी कहानी गांव वालों को सुनाई.
कुछ ने शोक जताया, तो कुछ ने कहा देखो कितनी अच्छी मृत्यु लिखा कर आईं थीं, गंगा में डूब गयी आदि आदि. बड़ी धूमधाम से तेरहवीं मनाई. सबने श्रवण कुमार रूपी
बेटे की बहुत प्रशंसा की. समय बीतता गया.
दृश्य-2 इसी गांव का एक व्यक्ति हरिद्वार
जाता है. वहां वह जब भिखारियों को भोजन करा रहा होता है और दान-दक्षिणा दे रहा होता
है तो राम प्रसाद की मां को पंक्ति में पहचान लेता है. मां फूट फूट कर रोने लगती है.
ट्विस्ट इन दि टेल : राम प्रसाद अपने घर में
रोज रोज की गृह कलह से तंग आकर मां को हरिद्वार यह कह कर छोड आता है कि मां मैं अभी
आया. गांव में आकर कहानी सुना देता है कि मां गंगा में बह गयी. लाश भी न मिली. इधर
मां यह सोच सोच कर ग्लानि में डूब रही थी और दुखी थी कि हो न हो मेरा बेटा या तो दुर्घटनावश
या जान-बूझकर गंगा में डूब गया है. अब मैं किस मुंह से गांव वापिस जाऊं.......?
Friday, July 6, 2012
CHACHA JI
A distant uncle of mine, so close to my dad that both
shared the common name by prefixing CHHOTE (uncle was the younger one, hence,
chhote) died last week in Delhi.
We had known the family ever since we were kids. We are four brothers and a
sister. They were opposite i.e. four sisters and a brother. Uncle was working
for Auditor General’s office, had humble beginning in his career as an Auditor
and by sheer hard work reached respectable level in the bureaucratic
hierarchy. ‘Simplicity, austerity, how
to make both ends meet’ if ever there was a book of this title, he could add a
chapter or two by what he followed through out his life. An example, I recollect, he would cut a cake
of soap into two halves the other half to be used only after the first half is
no more usable as he believed, this way the soap lasts longer. Also he will
dispense tooth paste or tooth powder himself to kids early morning, morning
after morning. He gave best of
education and married off all his four daughters to fairly decent grooms. The only son whom my aunt will carry in her
lap out of affection and display her prized trophy got everything in silver
platter. VIP of the family, he was
treated also like one by the family. I
used to wonder that he (boy) is old
enough to walk why my aunt still carries this over sized boy - word ‘chubby’ got
added much later to my vocabulary. We
hardly knew of discrimination, if any, between son and a daughter. The boy was
admitted for his graduation to the college nearest to uncle’s house i.e. across
the road. Even then my uncle would be
there on this side of the road anxiously waiting for him if he was late even by
few minutes. Though uncle was dead
against any woman working, but it was his lot that he got a working daughter- in-law
Two years back, my uncle (retired 15 years back) fell
unconscious in a temple never to regain his consciousness. He went in coma and became a comatose. His death, last week, in a way, though cruel
to say, delivered him from his sufferings.
My uncle never had any bad habit except, perhaps, two cups of tea in a day:
11 a.m. and 4 p.m. by the clock. He had
to suffer and live like a vegetable for two years, nay, for 730 days and
nights. My poor aunt was totally
shattered during these long two years due to, one, helplessly seeing her
husband die inch by inch and still hope that a miracle will bring him to his
normal self, two, by the callous attitude of this VIP son.
The VIP whom aunt would not let go from her lap even when
he had become fully grown, able to walk boy declared that he would like to have
a separate kitchen. Residing in his
father’s (uncle) house, it required a big heart to make such an unreasonable
demand and bigger heart on the part of my uncle to readily agree to it. Imagine, under one roof two kitchens! Poor aged and ailing aunt. Tantrums, contempt and indifference of son
and his family grew so much that my aunt was silently praying for an early
death of my uncle. Now that my uncle is
cremated, I hear, son has ambitious plans for his father’s property of few
crores made singlehandedly through the sweat of his brow.
In this entire scheme, my aunt has a place, my uncle would have never wished for his worst enemy.
In this entire scheme, my aunt has a place, my uncle would have never wished for his worst enemy.
Epilogue : Seeing chacha ji‘s corpse, my
father recollected and sent me this so
very meaningful quote of Saint Kabir, my father had this in his syllabus way back in 1947.
“ सुन गंगाराम
पिंजरा पुराना तेरा हो गया
जब तक हंसा रहा पिंजरे
में पिंजरा हरा रहा
उड़ गया हंस, पिंजरा खाली, बोलनहारा गया
सात-पांच मिलकर उपाय
सुझाया
गठरी-ठठरी बांध लिया
चार जने कंधे पर धर
के जंगल वासा करा दिया
डार चिता में काठ चुना
तब, पावक उसमें लगा दिया
जला फूंक कर चले कुटुम्बी, भुगतेगा दुख एक जीया
जल में जल, मिट्टी में मिट्टी, सांस पवन में चला गया
कहत कबीर सुनो भई साधो
सब रचना को छोड़ गया”
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