Ravi ki duniya

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Sunday, September 8, 2024

व्यंग्य: नौयडा का अपना कल्चरल कैलेंडर होगा

 


 

(नौकरशाही ने फैसला लिया है नौयडा का पृथक कल्चरल कैलेंडर अपनाने का)

 

         

      एक कहावत है ‘जब मैं कल्चर शब्द सुनता हूँ तो अपनी बंदूक की ओर बढ़ता हूँ’। पहले ऐसा कहा जाता था कि भारत में एक ही कल्चर जानी जाती है और वह है एग्रीकल्चर (इसे प्रायः पंजाब के लिए भी विनोद में कहा जाता रहा है) अब देखिये कल्चर बहुत ही मज़ेदार टर्म है। यह कभी पुराना नहीं पड़ता। जब कुछ नहीं था तब कल्चर थी, आज जब लगता है सब कुछ है, भले ई.एम.आई. पर सही, यह भी कल्चर का हिस्सा है। भूख भी कल्चर है, ठूंस-ठूंस कर खाना भी कल्चर है। गोया कि कोई एक रिवाज कल्चर है तो ठीक उसका उलट भी कल्चर ही कहलाता है।

 

        अब आप देखिये पहले होटल/रेस्टोरेंट में खाना ऐश और लक्जरी का प्रतीक था।  मजबूरी अथवा बतौर अय्याशी होटलों में खाया जाता था। जबकि आजकल बात-बात पर या कहिए हर बात पर होटल याद आता है। उसी तरह पहले ट्यूशन पढ़ना अच्छा नहीं माना जाता था। ऐसे बच्चों को  अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था। आज अगर आप अपने बच्चे को कोचिंग नहीं कराते हैं तो आप अपने ही बच्चों के दुश्मन हैं।

 

          एक क्षेत्र विशेष की कल्चर  दूसरे हलके में भी कल्चर मानी जाये ऐसा जरूरी नहीं। बहुत कन्फ़्यूजन रहता है। इसी कन्फ़्यूजन में इजाफा करने को अब तय किया है कि नौयडा का अपना अलग कल्चरल कलेंडर बनाया जाएगा। नौयडा की ट्रेजिडी ये है कि यह यू.पी. में है या दिल्ली में है। यहाँ दिल्ली की कल्चर चलेगी/मनाई जाएगी या फिर यू.पी. के रीति-रिवाज मान्य होंगे। मनाए जाएँगे।

 

           अब सवाल ये है कि मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं। इसका हल नौयडा ने निकाल लिया। नौयडा ने डिक्लेयर किया है कि हम अपना अलग ही कल्चर रखेंगे...हम अपना अलग ही कल्चरल कलेंडर रखेंगे। ये हुई न बात। इस कलेंडर में मैं चाहूँगा कि सभी वर्गों का ख्याल रखा जाये। जैसे कि आटो वालों का, उन्हें वहीं नहीं जाना होता जहां आप जाना चाहते हो। अगर जाना भी पड़ जाये तो वह दुगना किराया मांगता है कारण कि बक़ौल उसके, लौटते में सवारी नहीं मिलती। जो आपका मोबाइल छीन कर ले भागते हैं उनके लिए भी एक दौड़ का आयोजन (क्रीडा दिवस) पर किया जाया करेगा। पुरस्कार स्वरूप तरह-तरह के मोबाइल रखे जाया करेंगे यथा फर्स्ट प्राइज़ लेटेस्ट आई-फोन बाकियों को अन्य ब्रांड के फोन दिये जाएँगे और सांत्वना पुरस्कार में ईयर-पॉड दे दिये जाएँ।  कार छीन कर भागना, साथ-साथ लंबी कूद, ऊंची कूद, लिफ्ट ले कर लूटने की प्रतियोगिता भी कराई जाएँ। आए दिन किसी न किसी की सवारी गाजे-बाजे और फुल वॉल्यूम डी.जे. के साथ जुलूस की शक्ल में निकाले जाती है इस बात को भी कल्चरल कलेंडर में शामिल करना चाहिए।  

 

         तेज़ रफ्तार गाड़ी चलाना, आड़ी-तिरछी गाड़ी चलाना, जान हथेली पर रख कर ओवर टेक करना भी नौयडा की कल्चर का अभिन्न अंग है। इसके साथ कॉलेज फ़ेस्ट की तरह नॉन-स्टॉप गाली देने के लिए भी एक दिन तय होना चाहिए। खरी-खरी गाली देना नौयडा की कल्चर है, इसका ख्याल रखा जाये। गाली हमारे समाज का दर्पण है। उसी तरह ट्रेफिक जाम भी हमारी कल्चर है, जरा सा कुछ हो जाये और तुरंत ट्रेफिक जाम लगना तय है। हमें अपनी इस कल्चर पर गर्व है। अभी टोल-टैक्स की तो बात हुई ही नहीं है मगर हमारे टोल-टैक्स खूब ही कुख्यात हैं। टोल नाके पर  मार-पीट भी हमारी कल्चर है यह भारत खासकर उत्तर भारत की ‘जानता नहीं मेरा बाप कौन है’ के नेरेटिव का सब ग्रुप है।

      नौयडा का संधि-विच्छेद नो+आइडिया होता है। हमें अपने नौयडा की कल्चर पर गर्व है।

 

Friday, September 6, 2024

व्यंग्य: स्कूटी चोरी और एफ.आई.आर. के 75 दिन

                    

                       नौयडा पुलिस ने एक स्कूटी की चोरी की रिपोर्ट लिखने में 75 दिन लगा दिये। वह भी तब लिखी जब बंदे ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया और दुनियाँ भर के दरवाजे खटका लिए। वह बेचारा डिलिवरी बॉय था स्कूटी किराये पर ली हुई थी। कहीं डिलिवरी को गया और पीछे से कोई उसकी स्कूटी ही उठा ले गया। अब शुरू हुआ उसका दर-दर, दफ़्तर-दफ्तर चक्कर थाने से थाने, पर उसको एफ. आई.आर. लिखवा पाने में सफलता नहीं मिली

 

                   अब बेचारी काम की मारी नौयडा पुलिस भी क्या करे उसकी जान को क्या एक काम है?  कभी वी.आई.पी. ड्यूटी, कभी मर्डर, कभी सुसाइड, कहीं डकैती, कहीं चोरी। कहीं ड्रग्स, कहीं छिनैती तो कहीं नाले में लाश। एक जान सौ झंझट। साला ! ये भी कोई नौकरी है ? अब आप ही बताओ इस तरह के संगीन माहौल में एक स्कूटी की रिपोर्ट लिखने में टाइम तो लगता है। शिकायतकर्ता ने जगजीत सिंह को ठीक से सुना ही नहीं। वो पहले ही कह गये थे प्यार की पहली चिट्ठी लिखने में वक़्त तो लगता है । यहाँ चोरी-डकैती और साइबर क्राइम से फुर्सत मिले तो स्कूटी की ओर ध्यान जाये। 


                           ये ऐसे ही है जैसे कोई अपनी साइकिल का रोना रोये। अरे भैया ! यहाँ देश की सुरक्षा और शहर का लॉ एंड आर्डर  देखें, नित नये वी.आई.पी. रूट देखें या स्कूटी की रिपोर्ट लिखें। न जाने कहाँ से चले आते हैं ये स्कूटी की भी रिपोर्ट लिखाने। कौन है इसका आविष्कारक ? ये क्या खिलौना सा चला दिया है, सो ईज़ी टू स्टील। और मुसीबत हमारी बढ़ा दी। अब इनकी स्कूटी पर भी नज़र रखें। भैया ! यहाँ एस.यू.वी. चोरी हो रहे हैं सोसाइटी में घुस कर लक्जरी कार उठा ले जाते हैं, वो तक तो मिलती नहीं हैं न जाने कब में वो नॉर्थ ईस्ट या नेपाल जा पहुँचती हैं। या यहाँ पड़ोस के शहर में ही ताबड़तोड़ काट दी जाती हैं। अब कोई स्कूटी को तो काटने से रहा। जितने की मेहनत लगेगी, उसकी लागत भी न निकलेगी। पता नहीं ये स्कूटी चलाई ही क्यूँ गयी है ? न ये साइकिल है, न ये स्कूटर है और इसके चोरों को पकड़ते हम फिरें। भाई अगर ये ऊटपटाँग चीज़ आपने ले ही ली है तो इसका रक्षा-कवच भी स्कूटी बनाने वालों को देना चाहिए। और नहीं तो जो खरीद रहा है ये उसकी जिम्मेवारी है- 'सवारी अपने सामान की रक्षा स्वयं करे' । पुलिस को और भी ज़रूरी काम होते हैं। जो स्कूटी से कहीं ज्यादा भारी और कीमती होते हैं। 


                         फिर मैंने सोचा ये बेचारा डिलिवरी बॉय एफ.आई.आर. कराने को पीछे क्यूँ था?  वो गाना है न 'मैं तुम्ही से पूछती हूँ मुझे तुमसे प्यार क्यूँ है....कभी तुम दगा न दोगे ये ऐतबार क्यूँ है'  पता चला कि बेचारे डिलिवरी बॉय ने ये किराये पर ली, मालिक तो पैसे माँगेगा या स्कूटी माँगेगा। आप कहेंगे चोरी हो गई, तो वो कहेगा एफ.आर.आर. लिखाओ क्यों कि बीमा वाले मांगेंगे। बीमा से क्या मिलेगा ? पैसा मिलेगा !....तो वही तो एफ. आई.आर. लिखवाने में थाने की प्रत्याशा रही होगी। आप शायद ठीक से सुने नहीं- सबका साथ-सबका विकास


                                 

Thursday, September 5, 2024

व्यंग्य: ड्रीम बाज़ार मॉल में लूट

 


 

                    (कराची में एक सच्ची घटना के परिपेक्ष्य में)

 

 

          मॉल वाले ग्राहक को लुभाने के लिए तरह तरह के हथकंडे इस्तेमाल करते हैं। दुनियाँ भर की छूट घोषित होती रहती है। कभी फेस्टिवल के नाम पर कभी क्लियरेंस के नाम पर। ग्राहक भी बेचारा कब तक अपनी और अपनी जेब की इज्ज़त बचाए। आखिर रज़िया फंस ही जाती है गुंडन में। एक मॉल ने तो हद कर दी जब घोषित किया कि अपने घर का कूड़ा-कबाड़ा लाओ और उसके वज़न के हिसाब से कूपन लो जो अंदर कैश हो जाएँगे। मुझे बहुत ताज्जुब हुआ जब लोग वाकई अपनी कार की डिक्की में कूड़ा-करकट ले कर पहुंचे हुए थे। एक सज्जन तो अपने घर का टूटा कोमोड और वाश-बेसिन तक उठा लाये थे। बिलकुल त्योहार सा माहौल था, चारों ओर गहमागहमी, अफरातफरी थी।  एक माॅल ने अपने बेसमेंट में कार पार्किंग की फीस 500/- रखी और ये 500/- आपको मॉल में ख़रीदारी में एडजस्ट हो जाता था। कैश बैक भी कुछ कुछ इसी तरह का हथियार है। एक के साथ दो फ्री आदि आदि। कुछ 'एड' आते थे कि मिल बंद कर रहे हैं, कुछ कहने लग पड़े मिल में आग लग गई बस जो बचा है वो आपकी सेवा में ले आए हैं। हमारा उद्देश्य मुनाफा कतई नहीं है। कुछ कहते 'भाईयों में झगड़ा हो गया है।' यह सुनते ही बीवी अपने शौहर से झगड़ पड़ती और पैसे ले, जा पहुँचती 'सेल' वाले की सुलह कराने।

 

           

           जब दुकानदार/मॉल चिल्ला-चिल्ला कर आपको बुलाते हैं कि सेल लगी है सेल। दो हज़ार की जींस दो सौ में ले जाओ। पाँच हज़ार की साड़ी तीन सौ में ले जाओ तो ग्राहकों खासकर ग्राहिकाओं के पैर बरबस ही मॉल की तरफ मुड जाते हैं। वो कौन सा गाना है “जाम जब सामने आ जाये तो मुकरना कैसा...” जब लफ्ज ‘सेल’ अपना अर्थ खो चुका तो बाज़ार में चिंता होना स्वाभाविक थी और नए शब्द, नई टैग लाइन पर 'ब्रेन स्टाॅर्मिंग' होने लग पड़ी। दरअसल दुकानदार भाईयों ने सेल को बारामासी बना दिया। पूरे बारह महीने तीसों दिन सेल ही चलती रहती। अगलों ने सेल के पक्के बोर्ड ही लगा छोड़े।  धीरे-धीरे ही सही मगर ग्राहक समझ गए ऐसी सेल का फंडा। अब अगर दुकानदार की ट्रिक ग्राहक समझने लग जाएँ तो समय आ गया है कि दुकानदार अपनी ट्रिक बदल दे।

 

 

         एक बात तो यह है कि हम लोग दीवाने हो जाते हैं अपना आपा खो देते हैं जब देखते हैं- फ्री है, डिस्काउंट पर है, एक के साथ एक फ्री है। कैश-बैक है, ई.एम.आई. है। फेस्टिवल ऑफर है, स्कीम चल रही है। हम ऐसी चीजों पर दिलो-जेब से फिदा हैं। फिर हम आगा-पीछा नहीं देखते। टूट ही पड़ते हैं।

 

 

          ये बदली हुई ट्रिक ही है जिसका नाम दिया गया ‘लूट’। बस कुछ बेहद अनुपयोगी, पुराने, डिफ़ेक्टिव पीस को लेकर ये व्यूह संरचना की जाती है। नाम दिया जाता है लूट। लूट लो। आपके शहर में आ गयी साल की, शताब्दी की सबसे बड़ी लूट। कोई भी टी-शर्ट मात्र पचास रुपये में। प्लाजो डेढ़ सौ रुपये में इत्यादि इत्यादि घोषणा की जाती है। ऐसे ही एक मॉल ने घोषणा की कि हमारे मॉल में फलां दिन लूट होगी। इसे ग्राहकों ने सच मान लिया और हुआ यूं कि मॉल खुलने के बाद हजारों ग्राहकों की इतनी भीड़ अंदर आ गई कि संभालना मुश्किल हो गया। एक तो लूट, दूसरे ड्रीम बाज़ार। ये क्या सपना सच होने जा रहा था। लोग टूट पड़े और मॉल को देखते देखते लूट ही ले गए। तोड़-फोड़ अलग कर गए। भगदड़ सी मच गई। ड्रीम बाज़ार मॉल सोच रहा होगा कि उनसे गलती कहाँ हुई? नाम ज़रूर ड्रीम बाज़ार मॉल था मगर उन्हें ऐसे रिसपाॅन्स की कतई सपने में भी उम्मीद नहीं थी। उधर ग्राहक जो लूट कर लाये थे वो झूम रहे थे “सच हुए...सच हुए सपने  मेरे...झूम रे मन मेरे”।

व्यंग्य: जनगणना जाति की

 


 

 

          खबर है कि हाई कमांड ने तय किया है कि ‘चलो हम जातिगत जनगणना करा लेते हैं। पर खबरदार जो इस पर राजनीति की तो ?” (अर्थात राजनीति भी हम ही करेंगे...तुम नहीं) नो पॉलिटिक्स प्लीज़ ! हमारे देश में जहां खेलों में राजनीति है, कॉलेज में राजनीति है। टीचर्स के सलेक्शन में राजनीति है। पोस्टिंग-ट्रांसफर में राजनीति है और खूब ही है। गोया कि राजनीति मात्र राजनीति में ही नहीं बल्कि हर जगह है। आप बताएं कहाँ नहीं है ? खेलों के लिए खिलाड़ी के चयन में क्या राजनीति नहीं होती ? आप बहुत भोले हैं यदि आप समझते हैं कि पॉलिटिक्स नहीं होती। उम्मीदवार के चयन में पॉलिटिक्स होती है। टिकट देने में पाॅलिटिक्स, काटने में पॉलिटिक्स। रेजीडेंट वेल्फेयर सोसायटी में पॉलिटिक्स है और भरपूर है। आप कोई एक संस्था, एक गाँव, एक नगर-पालिका बताओ जहां पॉलिटिक्स नहीं है। क्या बाबाओं के आश्रम, क्या फिल्म लाईन, क्या फिल्मी कलाकार-कलाकारनी, क्या बी.एम.सी. क्या क्रिकेट, क्या ओलम्पिक। जात नकारने वालों को कहें मकान किराये पर लेने जाएँ तो निर्णयात्मक प्रश्न जात का ही होता है। चाहे दिल्ली हो या मुंबई। दूर जाने की ज़रूरत नहीं इतवार को विवाह के एड वाले कॉलम उठा कर देख लें। हम तो वो हैं जो विदेश में भी अपनी जात साथ ले जाते हैं और जहां दूसरा इंडियन दिखा नहीं कि जात का कीड़ा बाहर आया नहीं।

 

           चक्कर ये है कि आप और किसी भी चीज़ में पॉलिटिक्स करने कहाँ देते हो। यहाँ तक कि पॉलिटिक्स में भी पॉलिटिक्स नहीं करने देते। कोई चूँ भी करे तो आप बरबस ही कह उठते हैं पॉलिटिक्स नहीं... पॉलिटिक्स नहीं ! हम किस पर पॉलिटिक्स करें फिर ? सच तो ये है कि जात जनगणना से बेहतर विषय पॉलिटिक्स के लिए हो ही नहीं सकता। ये बोले तो ‘गेम-चेंजर’ है। मास्टर स्ट्रोक है। वो भी दोनों पार्टीज़ के लिए। जो सत्ता में होगा उसके लिए भी और जो विपक्ष यानि प्रतिपक्ष में होगा उसके लिए भी। यूं कहने को रहता है हम भारतीय पहले हैं, हम भारतीय आखिर में भी हैं। पर सच आप भी जानते हो। हम भारतीय होने से पहले ऊंची जात, नीची जात हैं, दलित हैं, स्वर्ण हैं। महादलित हैं। ब्राह्मण हैं, बनिया हैं। और इतने पर भी बस नहीं। हम कान्यकुब्ज हैं हम सरयुपानी हैं। ओ.बी.सी. हैं तो मलाई वाले हैं अथवा बेमलाई वाले हैं। यही सब होता रहे तभी न हम मलाईदार पोस्टों पर क़ाबिज़ रहेंगे। 

            

 

         अब देखते हैं कि ये जो पॉलिटिक्स है ये जनगणना मे नहीं होगी तो भला कहाँ होगी। पहले देखते है कि जनगणना पर किस किस्म की पॉलिटिक्स हो सकती है। ‘क’ जाति कहेगी हम संख्या मे ज्यादा है हमें हमारे संख्या बल के हिसाब से हिस्सेदारी चाहिए। ‘ख’ जाति कहेगी ये ‘ग’ जाति को इतनी सीट क्यों कर ? जबकि उनकी संख्या तो हमसे कम है। इसके अलावा और तो क्या ही मांग लेंगे। बाई दी वे, आप अब भी तो केंडीडेट चूज करने, टिकट देने मे जाति देखते हैं। बंदे की जाति तो देखते ही देखते हैं चुनाव क्षेत्र विशेष में रहने वाले बाशिंदों की भी जात देखते हैं। और उसी तरह टार्गेट ग्रुप को एड्रेस किया जाता है। कुछ मार-काट मचाई जाती है। कुछ ऊटपटांग योजनाओं की घोषणा की जाती हैं, उनके भूले-बिसरे आइकॉन को सम्मान दिया जाता है, छह महीने में ज़मींदोज़ हो जाने वाले पुतले लगाए जाते हैं। सब जात का खेल है। यूं कहने को रहता है जात पर न पात पर मोहर लगेगी..... और या फिर सबका साथ सबका विकास। भैया पहले अपना विकास दूसरे भी अपना और अपने परिवार का विकास और अंत में भी केवल अपना और अपनों का विकास।

व्यंग्य: बुलडोजर के दो आगे बुलडोजर

 


 

              पहले एक पहेली चलती थी तीतर के दो आगे तीतर... बस उसी तर्ज़ पर बुलडोजर के दो आगे बुलडोजर। बड़े-बूढ़े कहते रहे हैं सेर को सवा सेर मिल ही जाता है। बस तो बुलडोजर के पीछे एक बुलडोजर लग गया। वो भी शीर्ष कोर्ट का।

 

 बुलडोजर भी गाता होगा:

 

  ‘जहां मैं जाता हूँ वहीं चले आते हो

 चोरी-चोरी मेरे दिल मे समाते हो

ये तो बताओ कि तुम मेरे कौन हो ?’

 

 

                                            यूं सियासत के पास चॉइस थी कि क्रेन लगाई जाये या बुलडोजर। क्रेन में क्या है कि माल उठवाया जा सकता है। पर बुलडोजर में जान-माल दोनों को क्षति पहुंचाई जा सकती है। और पब्लिसिटी के लिए भी मुफीद है। पर कोरट ने इसका बुरा मान लिया है और हमारे बुलडोजर की पीछे-पीछे अपना एक बुलडोजर लगा छोड़ा। पहले बड़ा सुभीता था कहीं कोई विरोध का सुर उठे बुलडोजर की ड्यूटी लगा दो। वो अपने आप न्याय करेगा। पहले एक 'हमुराबी कोड' चलता था- "आँख के बदले आँख-दाँत के बदले दाँत"। पर हमारा बुलडोजर उससे आगे का सोपान है यहाँ हर चीज़ के बदले बुलडोजर। बोले तो सिंगल विंडो क्लियरेंस की तरह सिंगल बुलडोजर, न कोई वकील, न जज, न मुंसिफ़ न पेशकार, न तारीख पे तारीख। बस बुलडोजर गया (आपका न्याय आपके द्वार, द्वार क्या पूरा घर-बार) देखी सुनी है ऐसी अद्भुत अनूठी न्याय संहिता कहीं और ? अब जो आई.पी.सी. की जगह बी.एन.एस. लागू हुई है, आपको क्या लगता है 'बी' से क्या बनता है ? यह हमारे देश की ईज़ाद है। आपने बुलडोजर के इन उपयोगों को देखा ही नहीं। इसीलिए तो कहते हैं इंडिया बिगिनर्स के लिए नहीं। हम डेमोक्रेसी की माॅम हैं। और माॅम सब जानती है।

        

           अब विचार यह है कि एक अदद बुलडोजर पार्टी का गठन किया जाये। बुलडोजर के छोटे-छोटे मिनी मॉडल बना कर शहर-शहर, मोहल्ले- मोहल्ले बांटे जाएँगे। अपना झण्डा भी बुलडोजर के चित्र वाला होगा। देखिये हमने विदेश से आए बुलवर्कर को दिलोजान से अपनाया था इसी तरह मुझे पूरा विश्वास है कि बुलडोजर को भी भारतवासी अपनाएँगे। कहीं कुछ भी गड़बड़ हुई बुलडोजर जाएगा और मिनटों में सब ठीक कर आयेगा। फर्ज़ करो कहीं रोड जाम है....बुलडोजर भेजो सब आनन-फानन में लेवल कर आएंगे। उसी तरह समझो कोई आंदोलन हो रहा है चढा दो बुलडोजर। मिनट से पहले आंदोलनकारी भागते नज़र आएंगे। सीमा पर बुलडोजर रखे जाएँगे। सर्जीकल स्ट्राइक के बाद अब देखो मेरा बुलडोजर स्ट्राइक। टोल टैक्स देने में बहुत मच-मच रहती है जो टोल टैक्स देने में आनाकानी करे बुलडोजर देख लेगा। बुलडोजर एक गेम चेंजर साबित होगा। दबंग लोग भी घर के आगे एस.यू.वी. और थार की जगह बुलडोजर पार्क किया करेंगे। बुलडोजर को इतनी इज्ज़त, इतना सम्मान और इतनी बड़ी भूमिका शायद ही पहले कभी मिली हो। क्या समां रहेगा। पार्टी के कार्यकर्ता, पार्टी के ऑफिस बेयरर बुलडोजर पर आया-जाया करेंगे। शादी-ब्याहों में बुलडोजर की धूम रहा करेगी। बुलडोजर दहेज में लिए-दिये जाया करेंगे।

             

                        बुलडोजर ज़िंदाबाद ! वोट फॉर बुलडोजर !  

Monday, September 2, 2024

व्यंग्य: जूता और भारतीय राजनीति

 


                             विश्व के अन्य देशों की तो पता नहीं किन्तु भारतीय खासकर भारतीय नेता जूते के आविष्कार से बहुत लाभान्वित हुए हैं। ये सब जूते के बेनीफिशयरी हैं। हालांकि जूता-चप्पल एक दूसरे के पर्याय हैं फिर भी बहुधा ये एक साथ चलें, आई मीन ! इस्तेमाल किए जाएँ तो अधिक प्रभावशाली होते हैं। फलां सभा में जूते-चप्पल चले, जूतों में दाल बांटना, बाप का जूता बेटे के आ जाये तो..., जूता चुराई की रसम, जिसका जूता उसका सिर, जूतों की माला, जूत ही जूत बजाए, ‘मेरा जूता है जापानी....’ क्यों चलाया गया? पता नहीं ! जबकि हमारे भारत में ही अच्छे और सस्ते जूते आम मिल जाते हैं। 

 

          पिछले कुछ सालों से भारतीय राजनैतिक क्षितिज पर जूतों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जूते मिसाइल की तरह नेता की तरफ फेंकने का रिवाज रहा है। कई बार जूता लगता है, कई बार चूक जाता है मगर अपने उद्देश्य में पूरा उतरता है। फुल-फुल पब्लिसिटी। ‘जूते मारो सालों को...’ एक लोकप्रिय टैग लाइन है मगर इसमें लोकप्रियता के साथ-साथ टिकट कटने का रिस्क रहता है। 

 

            जूतों की माला को खराब क्यों समझा जाता है ये समझ से परे है। फूलों की माला को सम्मान का प्रतीक माना जाता है। जबकि फूल जल्द ही मुरझा जाते हैं, फूलों से एलर्जी होती है। कपड़ों पर फूलों के लाल-पीले निशान पड़ जाते हैं जो मुश्किल से जाते हैं। जूते की माला प्रेफर की जानी चाहिए बस शर्त ये है कि जूते नए हों, नाप के हों और दोनों पाँव के हों। भई नोटों की माला लोग-बाग खासकर दहेज वाले दूल्हे पहनते ही हैं और खूब इठलाते बल खाते फोटो भी खिंचाते हैं। दुल्हन को क्यों नहीं नोटों की माला पहनाई जाती ? आखिर उसके दिये दहेज और सगाई में मिले नोटों से ही तो दूल्हा नोटों की माला पहनता है।

 

              कादर खान साब का एक डाॅयलाॅग है “हम वो हैं, जिसकी बेइज़्ज़ती कर दें तो उसकी इज्ज़त हो जाती है” कुछ इसी तर्ज़ पर नेता कह सकता है कि उसे अमुक बड़े नेता ने जूता मारा था या फिर उसने अमुक बड़े नेता पर जूता फेंका, वह दिन दूर नहीं जब उभरते नेता लोग अपने सी.वी. में यह लिखने लग जाएँगे। मुझे जूता खाने का दस साल का तजुर्बा है। या फिर मेरे जूता फेंकने का स्ट्राइक रेट 90% है। मैं जूता खुशी-खुशी खा सकता हूँ और वक़्त ज़रूरत मार भी सकता हूँ। बाद में प्लीज़ आप देख लेना। जूतों की माला, गधे की सवारी और काला मुंह करना, इन तीनों का एक कॉम्बो होता है वह किस्सा फिर कभी।

 

         भारतीय नेताओं में जूता बहुत लोकप्रिय है। यह खाने के काम आता है, मारने के काम आता है, फेंकने के काम आता है या फिर यूं ही बस उछालने के काम आता है। आजकल के बदले हुए हालात को देखते हुए ही मुहावरे में समुचित संशोधन कर दिया गया है। अभी गज़ट में नहीं आया। वह है ‘नेकी कर जूते खा’

 

 

Sunday, September 1, 2024

व्यंग्य: चोरी तो नहीं की है


 


 अकबर इलाहाबादी साब की एक ग़ज़ल ग़ुलाम अली जी ने गाई है:

 

       हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है

        डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है

 

नेता जी ने कहा है कि भला सूबे के हालात के लिए वो क्यूँ रिजाइन करें। उन्होने कोई चोरी तो नहीं की है। भई सूबे में अगर अमन-चैन नहीं है, परस्पर लड़ाई, मार-काट और आगजनी मुसलसल चल रही है, लोगों को ज़िंदा जलाया जा रहा है। उनके घर जला दिये गए हैं। यह खुले आम कहा जा रहा कि नेता जी दो समुदायों में से एक का पक्ष खुला-खुला ले रहे हैं। मगर नेता जी का कहना है कि इससे क्या...कुछ तो लोग कहेंगे। लोगों का काम है कहना। मगर फिर वही बात, मैं रिजाइन क्यूँ करूँ ? मैंने कोई चोरी तो नहीं की है।

 

       पहले ऐसा नहीं था। लाल बहादुर शास्त्री जी ने नहीं कहा कि मैं रिजाइन क्यूँ करूँ ? मैं क्या रेल चला रहा था ?  रेल ड्राइवर चला रहा था, रिजाइन करे तो वो करे, रेल चलाने में मैं कहाँ से आ गया। इसी तर्ज़ पर नेता जी ने कहा है कि सूबे में मार-काट मची है तो इसमें मेरा क्या दोष ? मैं तो नही कर रहा और ना ही मैंने चोरी की है। दूसरे शब्दो में अगर मैंने चोरी की है तो मैं रिजाइन करूंगा नहीं तो नहीं। ‘नो चोरी-नो रिज़ाइन’। मार-काट, रेप, घर जला देने पर अगर रिजाइन करने का चलन चलेगा तो किस सूबे के नेता महफूज रह पाएंगे। कोई ग़लत चलन नहीं चलाना है। शास्त्री जी ने गलत परंपरा डाल दी। आज तक हम लोगों को उनका उदाहरण देकर उलाहना दिया जाता है, हम बहादुर हैं हम डट कर सामना करेंगे। रण मैदान से भागेंगे नहीं। कितनी ही मार-काट मचे, कितनी ही रेल दुर्घटनाएँ हों। और फिर ये बताइये  रिज़ाइन करना किस चीज़ का इलाज़ है ? मेरी जगह जो आयेगा वो भी तो आदमी ही होगा ना। कोई मंगल ग्रह से तो आयेगा नहीं।

 

           वो मेरे रक़ीब पर थे क्यूँ इतने फिदा

            आखिर वो भी मेरी तरह इंसा निकला

 

वैसे ऐसा नहीं है कि नेता जी हमेशा से ऐसे थे। असल में तो एक बार वे रिज़ाइन करने का मन बना चुके थे। मगर उनके सपोर्टरों को पता चल गया और वो आनन-फानन में उस कागज को ही लेकर दौड़ गए जिस पर उन्होने  रिज़ाइन लिखना था। बशीर बद्र साब ने एक जगह लिखा था:

 

    मुझे लिखने वाला लिखे भी क्या मुझे पढ़ने वाला पढ़े भी क्या

    जहाँ मेरा नाम लिखा गया वहीं रौशनाई उलट गई

 

यहाँ तो अगले कागज ही ले उड़े। तब से दूसरा कागज़ ढूंढ रहे हैं मगर मिला नहीं। हाँ इस बीच ये ज्ञान ज़रूर हुआ कि आखिर रिजाइन क्यों किया जाये।    कोई चोरी तो नहीं की है। जैसे अकबर इलाहाबादी साब ने शराब ही तो पी थी और वो भी थोड़ी सी। फिर हंगामा क्यूँ। नेता जी ने चोरी तो नहीं की फिर रिज़ाइन क्यूँ ?

 

वो असल बहादुर हैं। वो उनमें से नहीं जो अपनी जिम्मेवारी से मुंह मोड लें  और भाग खड़े होते हैं। वो डट कर मुक़ाबला करेंगे। मांगने दो रिज़ाइन अगर दुनियाँ रिजाइन मांग रही है। ये होते कौन हैं मुझ से रिज़ाइन मांगने वाले हो न हो ये विपक्ष की कोई चाल है। मैं भी कहने वाला हूँ “जाओ जाकर पहले उस से साइन ले कर आओ जिसने मेरे हाथ पर लिख दिया कि.... फिर भाई तुम जिस कागज पर कहोगे, जहां कहोगे, मैं साइन कर दूंगा”। क्या महज़ मार-काट, असंतोष, रेप, और पूरे सूबे में आगजनी, पुलिस के हथियार लूट लेने मात्र पर मैं रिज़ाइन कर दूँ ? ये क्या बात हुई। ऐसे चलती है सियासत ?

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जागो इंडिया जागो ! खेलो इंडिया खेलो !