Ravi ki duniya

Ravi ki duniya

Friday, July 4, 2025

चिर-युवा शतायु देव आनंद (26.9.1923--3.12.2011) (अपने फेवरिट नायक को एक ट्रिब्यूट)

 





 

           देव साब का जन्म 26 सितंबर 1923 को गुरदासपुर, पंजाब में हुआ था। उनके पिता पिशोरीमल एक सफल वकील थे। वे चार भाई, पाँच बहन थे। उनके नॉन-फिल्मी भाई थे मनमोहन आनंद जो वकील थे। बहनें सावित्री, शील कांता, कान्ति, लता, ऊषा  हैं।  अभिनेता विशाल आनंद, (..चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना..) अरुणा (परीक्षित साहनी की पत्नी)  सावित्री की संतान हैं। ।  शेखर कपूर, सोहैला कपूर  और नीलम (नवीन निश्चल की पत्नी) शील कांता की संतान हैं।

   

            देव साब ने अपने बड़े भाई चेतन आनंद के साथ मिल कर 1949 में फिल्म निर्माण संस्था नवकेतन की स्थापना की. केतन (आनंद) चेतन आनंद के बेटे का नाम है।

 

         देव साब की दो खासियत जो किसी का भी दिल मोह लेंगी। एक तो वह अपना फोन (लैंडलाइन) खुद उठाते थे दूसरा, अपने खत खुद अपने हाथ से लिखते थे। वो इतना आहिस्ता बोलते और सॉफ्ट स्पोकन थे कि आपको जरा भी एहसास नहीं होने देते थे आप कितनी बड़ी हस्ती से मुखातिब हैं। देव साब अंग्रेजों के जमाने के इंगलिश ऑनर्स स्नातक थे लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से। जब उनकी फिल्म ‘हम दोनों’ का रंगीन वर्जन तैयार हुआ तो उन्होने खुद पास भेजा और मेहमानों को रिसीव करने स्वयं गेट पर थे। अपने कार्य अर्थात फिल्मों के प्रति इस कदर दीवानगी और उनकी प्रतिबद्धता बेमिसाल थी। उनकी जैसी विशाल लाइब्रेरी विरले ही किसी फिल्म वाले के पास होती। हरदम चुस्त दुरुस्त तैयार रहते और दिखते थे। केज्युल दिखना-रहना क्या होता है उन्हें नहीं पता था न आपने कभी उनकी कोई फोटो केज्युल लिबास में देखी होगी। अगर मफ़लर राजकुमार ने लोकप्रिय बनाया तो स्कार्फ देव साब की खासियत थी यूं वो टाई और सूट में बहुत जँचते थे। फिल्मों में भी उनकी छवि सदैव एक ‘अर्बन-यूथ’ शहरी बाँके नौजवान की रही। आगामी 26 सितंबर 2023 को वे 100 बरस के हो जाते। उनके जन्म दिन पर लोगों का तांता लग जाता था। क्या कारोबारी, क्या फिल्म वाले,  होटल वाले, क्या मित्र लोग सब आ जुटते। एक बार मुझे याद है वे अपना जन्मदिन मनाने मुंबई के ‘सहारा सिटी’ जा रहे थे उनके मित्र सहाराश्री के आग्रह पर।

 

    ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ उनकी आत्मकथा है। जो 2007 में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी ने रिलीज की थी देव साब और मनमोहन सिंह जी का जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है।

 

                   


           पदमभूषण (2001) देव साब कितने महान और प्रतिभाशाली आइकॉन थे इस बात का पता इससे लगता है कि जब 2013 में भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष होने पर भारत सरकार के डाक विभाग ने जो स्टांप जारी की उस पर देव साब का चित्र था। देव साब को दादासाहेब फाल्के (2002) पुरस्कार देने से, पुरस्कार की इज्ज़त अफजाई हुई। वे सात बार फिल्मफेयर एवार्ड के लिए नामित किए गए और तीन बार यह उन्हें मिला साथ ही लाइफ टाइम अचिवमेंट अवार्ड भी उन्हे मिला (1993)

 

         1946 मे रिलीज हुई पी एल संतोषी की ‘हम एक हैं’ से लेकर चार्जशीट (2011) तक 112 फिल्मों में काम किया। जिसमें से 33 फिल्मों का निर्माण/निर्देशन भी उन्होने स्वयं किया। अपनी 13 फिल्मों की कहानी भी उन्होने खुद लिखी। किशोर भानुशाली से पहले सेवआनंद देव साब के ‘लुक-एलाइक’ रहे हैं।

 

      देव साब का निधन 88 वर्ष की आयु में 3 दिसंबर 2011 को लंदन के ‘वाशिंगटन मेफेयर’ नामक होटल में हृदयगति रुक जाने से हुआ। देव साब ने सुरैया के साथ 7 फिल्में, वहीदा जी के साथ 7 फिल्में, हेमामालिनी के साथ 9 फिल्में और मधुबाला के साथ 8 फिल्मों में काम किया। 6-6 फिल्में ज़ीनत अमान और गीता बाली के साथ कीं। देव साब को संगीत की, गानों की बहुत समझ थी। रिकॉर्डिंग के समय खुद मौजूद रहते। उनकी फिल्मों का संगीत एकदम नायाब, गीत एक से बढ़ कर एक। कितनी ही नई प्रतिभाओं को उन्होने मौका दिया। उनका कैरियर संवारा।

                                           


        

       उनके स्विट्ज़रलैंड में जन्मे और अमेरिका से एम.बी.ए. शिक्षित बेटे सुनील आनंद (1956) अविवाहित हैं। वे अब नवकेतन स्टुडियो और आनंद रिकॉर्डिंग स्टुडियो का काम संभाल रहे हैं।  देव साब की एक बेटी है देविना। देविना की शादी बोनी नारंग से हुई। देविना की एक बेटी है जिना नारंग जिसका जन्म 1986 में हुआ और वह अपने पिता की तरह ही पाइलट बनी है। जिना एक फैशन फॉटोग्राफर भी है और शॉर्ट फिल्में बनाती हैं। उनका विवाह प्रयाग मेनन से हुआ है जो स्वयं भी फैशन इंडस्ट्री से हैं।

 

       देव साब की पत्नी कल्पना कार्तिक (मोना सिंह) अपना एकाकी जीवन मुंबई/ऊटी में बिताती हैं।

 

        नायक आएंगे जाएँगे.. देव आनन्द अपनी फिल्मों के माध्यम से सदैव हमारे बीच रहेंगे। जोश और हमेशा जवाँ दिल का दूसरा नाम देव आनंद था, है और रहेगा।

 

सरमा जी के जिन्न

 

         

   वह मेरे कार्यालय में काम करता था। यह ग़लत है असल में मैंने उसे कभी काम करते नहीं देखा, काम करते क्या मैंने उसे अपने तीन साल के कार्यकाल में कभी देखा ही नहीं। बस उसके बारे में सुना था। अलग-अलग लोग अलग- अलग अपने ढंग से उसके बारे में बताते। मैं जितना सुनता जाता उतनी मेरी उत्सुकता बढ़ती जाती थी। ऐसा नहीं है कि उसको आकर ऑफिस जॉइन करने की हिदायत पहले नहीं मिली थी। मेरे पूर्ववर्ती सहकर्मियों ने भी ट्राई किया और फिर सरमा जी को उनके हाल पर छोड़ दिया।

 


आप सोच रहे होंगे कि ऐसी क्या बात हुई। कोई क्यों इतनी बड़ी इज्ज़त वाली नौकरी, उप मुख्य अधिकारी की। क्यूँ इस तरह बेकद्री करेगा। हम सबको सब तरह की समस्याएँ होती हैं आकार-प्रकार बदलता रहता है मगर हम सबकी अपनी-अपनी समस्याएँ हैं अपने-अपने ग़म हैं। धीरे-धीरे सरमा जी की समस्या बढ़ने लगीं। उसी अनुपात में बल्कि उससे कहीं ज्यादा वो खुद बहुत बड़ी समस्या बन गये थे। हुआ ये कि एक दिन सरमा जी ने हमारी एक सह संस्था (इंस्टीट्यूट) में वहाँ के हेड को फोन खड़खड़ा दिया “ मैं सरमा बोल रहा हूँ आपके इंस्टीट्यूट वर्किंग के बारे में बहुत कम्प्लेन्ट्स आ रही हैं मुझे विशेष तौर पर भेजा गया है। अतः आज दोपहर को मैं आ रहा हूँ। ऐसे नहीं चलेगा” फोन रखते-रखते महानिदेशक महोदय थरथराने लगे। ये क्या साला बैठे बिठाये मुसीबत आन पड़ी। अफरा तफरी मच गयी। सबको जरूरी निर्देश दे दिये गए, जितना जो कुछ चमकाया जा सकता है चमकाया जाने लगा। दोपहर होते-होते सरमा जी आ धमके। उन्होने महानिदेशक को खूब डांटा। कभी-कभी महानिदेशक को शक भी पड़ जाता मगर सरमा जी की बात काटने अथवा प्रतिकार करने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी। वह खूब डाँट-डपट कर तुरत फुरत चले गए और महानिदेशक को पसीना-पसीना छोड़ गए। महानिदेशक ने मोबाइल की  सीरीज़ से पता लगाया कि ये सीरीज़ मेरे विभाग/ऑफिस वालों को मिली हुई थी। महानिदेशक मेरे अच्छे मित्र थे उन्होने मुझे फौरन फोन लगाया और पूछा “ये सरमा कौन है?” 


सरमा जी हमारे ऑफिस में रोल पर थे। वो धीरे धीरे उप मुख्य अधिकारी बन गए थे पर पता नहीं क्यूँ कहाँ उनके अंदर कोई फ़्रस्ट्रेशन थी। वह ऊटपटाँग बोलने लगता। अज़ब अज़ब हरकत करने लगता। चिल्लाने लगता। कभी इंगलिश बोलने लगता कभी कोई अन्य भाषा। बोलना क्या बड़बड़ाने लगता। ऑफिस में उसे लेकर डर का माहौल बन गया। कोई उसके पास फाइल लेकर जाने को या केस डिस्कस करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह कहीं से भी टेक ऑफ करता। मसलन एक सांस में बोलना 


" इन दि नोन हिस्ट्री ऑफ मैनकांइड दि फंडामेंटल राइट्स ऑफ ह्युमन वर नाॅट सप्रैस्ड इवन इन डार्क काँटीनेन्ट्स ऑफ अफ्रीका द वे दे आर बीइंग ट्रैंपल्ड इन दिस रीजीम/ऑफिस। आई रिफ्यूज टू वर्क एंड कैन नाॅट बी ए पार्टी टू दिस कांइड ऑफ वर्किंग"


कभी आप कोई केस डिसकस कर रहे हैं वो एकदम नेशनल या इन्टरनेशनल विषय पर प्रलाप करने लगता। अब तक ऑफिस में ये राय बन चुकी थी कि उसका कोई स्क्रू ढीला है और उसका ऑफिस में रहना-रखना खतरनाक है। उसको 'स्पेशल मेडिकल' के लिए भेज दिया गया। 



पता नहीं वह स्पेशल मेडिकल को गया भी कि नहीं। बस उस दिन से सरमा जी ने 'वर्क फ्राॅम ऑफिस' कर लिया। जिस तिस को फोन घनघना देते। कुछ भी अंड शंड बोलने लगते। घंटों घंटों पूजा में बैठा रहता। जब जाओ वो पूजा कर रहा होता। एक बार दो लोग 'वेट' करते रहे कि उनके लिए मिल कर जाना बहुत जरूरी है उन्हें एक पत्र देना है और उनके हस्ताक्षर चाहिये पावती के तौर पर। घंटों इंतज़ार के बाद सरमा जी बाहर आए, कुछ बुदबुदाते हुए। हाथ में एक लुटिया पकड़े हुए थे। उसमें से पानी की छींटें इधर उधर मारते जा रहे थे। ऑफिस के इन दो लोग को देख कर वो भड़क गए। वापिस घर में घुस गए और लौट कर आए तो उनके हाथ में कटा हुआ नींबू था और मंत्र पढ़ते हुए इन ऑफिस के दोनों लोग पर फेंक दिया और लुटिया का पानी भी उन पर डाल दिया। वो बेचारे जैसे तैसे जान बचा कर भागे। जिसे कहते हैं न सिर पर पैर रख कर भागना। उसके बाद कोई उनके घर जाने की हिमाकत नहीं करता। लोगों को लगता न जाने कौन सा जिन्न हमारे पीछे दौड़ा दे। 


महानिदेशक महोदय को जब सब विस्तार से बताया तो वे बोले अगर ऐसा है तो इसको ऑफिस का फोन क्यूँ दे कर रखा है। फौरन उससे ले लो। अब बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। यह तय हुआ कि फोन के सिम को डिएक्टिवेट कर दिया जाये। कमसेकम न्यूसेंस तो नहीं होगा। तिस पर महानिदेशक महोदय  मुझ से राइटिंग में नोट मांगने लगे। मुझे हंसी तो आई कि अभी  तो इतनी लंबी लंबी छोड़ रहे थे अब फोन डिसकनेक्ट करने को भी लिखित में चाहिए। खैर मैंने दे दिया। पर इससे सरमा जी की सेहत पर, रवैय्ये पर कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जाने लगी। क्यों कि उनकी सर्विस 20 साल से ज्यादा हो चुकी थी अतः यह तय पाया गया कि उन्हें कंप्लसरी रिटायरमेंट की पेनल्टी लगा कर गुड बाई  कर लिया जाये। मगर इस पर हमारे एक सीनियर अड़ गए "यार ये पाप मेरे हाथों से क्यूँ करा रहे हो ?" इस बीच मेरा ट्रांसफर हो गया। 


कालांतर में पता लगा कि सरमा जी का रोग बढ़ता गया। अंततः तंग आकार उनको कंपल्सरी रिटायर कर ही दिया। लोग कहते हैं कि उनकी शादी नहीं हुई थी। एक भाई था जो साथ रहता था वह भी 24 घंटे में 22 घंटे पूजा-पाठ में लगा रहता। लोग एकदम पागल नहीं होते हैं धीरे धीरे होते हैं और पूरी केयर और दवा-दारू के अभाव में उनका मर्ज बढ़ता जाता है और उसकी परिणिति सरमा जी में ही होती है। उनकी मृत्यु का सुन कर मुझे दुख हुआ कि एक अच्छी भली ज़िंदगी कैसे 'वेस्ट' हो गई।

Thursday, July 3, 2025

व्यंग्य: नौ बच्चों की माँ प्रेमी संग फरार

 

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            यह एक प्रकरण पर्याप्त है दुनियाँ को इस बात का यक़ीन दिलाने को कि प्यार, प्रेम, मुहब्बत बहुत बड़ी नियामत है। यह किसी बंधन को नहीं मानती। यह कभी भी हो सकती है। कहने को तो एक मशहूर शेर है:

 

           मुहब्बत के लिये कुछ खास दिल मखसूस होते हैं

           ये वो नगमा है जो हर साज पर गाया नहीं जाता

 

पर आप देख रहे हैं ये नगमा ना जाने कौन-कौन से किस- किस साज पर गया जा रहा है। प्रेम विश्वव्यापी है। सर्वव्यापी है। यह अंधा होता है। न्याय की देवी की तरह। ये कोई फर्क नहीं करता है। अब आप इस घटना को ही देख लीजिये जहां एक नौ बच्चों की मां का दिल आ गया। अब आ गया तो आ गया। दिल का क्या ग़म गया तो गया। इन नौ बच्चों में से तीन बड़ी लड़कियां तो शादीशुदा बताई जाती हैं। अब ये बात छोड़िए की उनके लिए क्या उदाहरण प्रस्तुत किया है। सब अपनी-अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं। अपने-अपने उदाहरण सेट करते हैं। कोई किसी के बताए मार्ग पर नहीं चलता। चलता होता तो आप जानते हो हम एक बेहतर दुनियाँ में रह रहे होते।

 

इन खातून ने ये साबित कर दिया है कि प्रेम का कोई विकल्प नहीं है। नौ बच्चों की मां की दिल की डाली हरी थी असली प्रेम की प्रतीक्षा में। और जब वो मिल जाता है तो कोई बंधन ऐसा नहीं जो पार न किया जा सकता हो। काटा न जा सकता हो। प्रेम की लहरें जब हाई टाइड पर आती हैं तो सैलाब आ जाता है। फिर हम-आप जैसे लोग बस वो ही करते हैं जो करने लायक हम बच रह गए हैं – बहस। नौ बच्चों के बाद भी उस खातून के अंदर एक लड़की ज़िंदा थी। उसके अरमान, उसकी हसरतें बाकी थीं। उसका पति सोचो कितना बड़ा ‘बोर’ होगा। कि वह भद्र महिला नौ बच्चों के बाद भी वेट करती रही। वह इस शादीशुदा ज़िंदगी में घुटन महसूस करती होगी। बंधनों से आज़ाद होने की ख़्वाहिश रखती होगी। जैसे ही पहला अवसर मिला व फुर्र हो गई। अतः बच्चे कितने हैं, कितने बड़े हैं, कितने शादीशुदा कितने कुँवारे हैं ये बेकार की बातें हैं और उनका कोई अर्थ नहीं। जब क्यूपिड महोदय अपना तीर मारते हैं तो प्रेमीजन बिलबिला जाते हैं और एक दूसरे के लिए मरहम का काम करते हैं।

 

                      मैं झंडू बाम हुई

 

 

नोट: पूरी घटना का दुखद हृदय विदारक पहलू है - पति का मृत पाया जाना। बच्चों की यह तस्दीक कि मां पहले भी चार पांच बार इन्हीं अंकल के साथ जा चुकी है। तब पापा समझा बुझा कर ले आते थे। और मां का तभी से गायब हो जाना

Wednesday, July 2, 2025

व्यंग्य : पूनम चंद जटिल


 

      रेलवे में अपने कार्यकाल के दौरान कई जगह पोस्टिंग के अनेकानेक खट्टे-मीठे अनुभव हुए और वो कहावत है न

 

                ' आदमी आदमी में अंतर

         कोई हीरा कोई कंकर '

 

इसी को इंगलिश में कहते हैं:

 

        देयर आर मैन,  एंड मैन

      सम आर स्टोन, सम आर जैम

 

पूनम चन्द जटिल क्या थे ? ये फैसला में आप पर छोड़ता हूँ।

 

 

              श्री श्री पूनम चंद जटिल जी से मेरी मुलाक़ात अपनी कोटा पोस्टिंग के दौरान अस्सी के दशक में हुई। वे कार्यालय में कल्याण निरीक्षक थे। कल्याण निरीक्षक का काॅडर रेलवे में अद्भुत है वह पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर सभी होता है। जो किसी का काम नहीं वह कल्याण निरीक्षक का। वह ऑफिस में कम फील्ड में अधिक नज़र आने वाली आत्मा है। उनको बीट भी दी जाती है। फलां स्टेशन से फलां स्टेशन तक के रूट पर सारे स्टेशन पर आपको जाना है और वहाँ दूर दराज़ इलाकों में बसर कर रहे रेल कर्मियों के ऑफिस के मुतल्लिक कामों में मदद करना।

 

                        अब ये मदद, सेवा, कल्याण बड़े ही क्लिशे से लफ्ज हैं। आप देख ही रहे हो नेता सब हमारी सेवा को हैं,  हमारे कल्याण को हैं या हम इनकी सेवा-पानी को।

 

                          हाँ तो हमारे नायक श्री जटिल जी को कभी ये बात अखर गई कि वे इतने बेहतरीन निरीक्षक हैं (वो थे भी) और कल के छोकरे टाइप जिनको बतौर उनके उन्होने सिखाया-पढ़ाया है वो आगे बढ़ गए हैं। अतः इसका बदला वो यूं लेते कि किसी अफसर की बात चले वो कहते ओह वो ? वो उनका जूनियर था। उनका चेला था, उनका बच्चा है आदि आदि। किसी ने उलाहना दे दिया यानि ताना मार दिया। जिसका अंजाम ये निकला कि जटिल जी ने कमर कस ली कि वे दिखा देंगे कि वो भी अफसर मैटीरियल हैं। बस पारिवारिक कारणों से यहाँ निरीक्षक में गुजर कर रहे हैं। हालांकि वे बड़े तेज़ तर्रार और सेवा-पानी कराने वाले निरीक्षक थे। अपना कल्याण पहले टाइप। तो जी जटिल जी ने विभागीय परीक्षा दी और पास भी हो गए। सब उनकी तारीफ करते नहीं थकते। होशियार है, लगता नहीं था, बहुत नाॅलिज़ है आदि आदि उनके विषय में कहा जाने लगा। जैसी कि सामान्यतः नीति होती है उनको अफसर तो बना दिया मगर पोस्टिंग दे दी मुंबई मुख्यालय में। अब मुंबई जैसे महानगर में जहां कदम कदम पर एक से बड़ा,  फ़न्ने खां, क्या ऑफिस, क्या शहर में कदम कदम पर मिल जाएँगे। जहां एक से बड़े एक, अफसर बैठते हों वहाँ बेचारे एक अदना से नए बने अफसर को कौन पूछे? फील्ड कोई था नहीं। बस एक विशालकाय पिरामिड था जिसके बॉटम पर जटिल जी अपने को पाते थे। मकान भी एक दम नहीं मिल जाता। बहुत दिनों तक  रेस्ट हाउस का एक बैड ही उनका आशियाना था। वहीं बेड के नीचे उन्होंने अपना काला ट्रंक रख छोड़ा था। अभी शनिवार का अवकाश चालू नहीं हुआ था, हुआ भी तो मुख्यालय का अज़ब काम है। शनिवार को सबको बुला भेजो, मीटिंग करो आदि आदि। अब जटिल जी आने सात बच्चों और पत्नी से मिलने को भी तरस गए।

 

                    एक बार उनसे रेस्ट हाउस में मुलाक़ात हुई तो वे एक रिप्रेजेंटेशन लिख रहे थे। उसका एक वाक्य मुझे अभी तक याद है “ मुंबई में प्रार्थी को कायदे का खाना नहीं मिलता है। इससे प्रार्थी की सेहत दिन- ब-दिन गिरती जा रही है, प्रार्थी के सात बच्चे हैं। प्रार्थी को मुम्बई की मैदे से बनी पूड़ी माफिक नहीं पड़ती। अतः प्रार्थी का ट्रांसफर कोटा नहीं तो कम से कम कोटा के नजदीक किसी मण्डल पर कर दिया जाये ताकि प्रार्थी अपने घर सप्ताहांत पर जा सके अथवा उसके घर से कोई आ सके।

 

 

                  इस रिप्रेंजेटेशन को वो खूब फॉलो करते, इस-उस से कहलवाते। सुनने में आया कि तंग आकर उनका ट्रांसफर प्रशासन ने रतलाम कर दिया। जिसके बाद कोटा मण्डल ही है। अब उनको वीकेंड पर जाने का सुभीता हो गया। इससे नुकसान ये हुआ कि उन की घर की हालत की चिंता करने को हर हफ्ते नया मेटीरियल मिल जाता। वे बहुत परेशान साला नाम जटिल क्या, ज़िंदगी ही जटिल बनती जा रही है। कोटा में कोई उन्हें पूछ भी नहीं रहा। अब वे परदेसी हो गए थे। जंगल में मोर नाचा किसने देखा। जैसा कि होता है माता पिता नहीं चाहते कि आप टिम्बकटू में राजदूत बन कर राज करें। इससे उनको/ उनका क्या ?

 

 

                         रतलाम आने के  एक महीने के अंदर ही उन्होने लैटर बॉम्ब की एक नई श्रंखला चालू कर दी। मजमून वही ! प्रार्थी अपने घर से दूर पड़ा है। परिवार की देखभाल नहीं कर पा रहा। प्रार्थी की बेटियाँ बड़ी हो रही हैं। उनकी शादी के लिए भी लड़का देखना है जो यहाँ रतलाम (मध्य प्रदेश) में रह कर मुमकिन नहीं। हर हफ्ते वो नए नए कारणों से मुख्यालय को लिखते रहते। रतलाम में उनके अफसर ने ये नस पकड़ ली और कह दिया कि आप कोटा अगले शनिवार रविवार तब जाएँगे जब ये काम खत्म हो जाएगा। वो काम में जुट जाते। जटिल से ज़िंदगी क्या क्या जटिल काम करा रही थी।  वो उस घड़ी को कोसते क्यूं उनके दिमाग में ये अफसर बनने का कीड़ा आया। निरीक्षक की ज़िंदगी कितनी शाही थी। सब हाथ बांधे खड़े रहते थे। उनकी मेहनत रंग लायी और लो जी उनका ट्रांसफर कोटा हो गया।

 

                    आप अगर सोच रहे हैं उनके जीवन में जटिलताओं का अंत हो गया तो आप गलत सोच रहे हैं। अब नई तरह की समस्याएँ उतपन्न हो गईं थीं। वे कल तक कोटा में ही निरीक्षक थे। आज कोई उन्हें अफसर मानने को ही तैयार नहीं था। सब अबे तबे तू तड़ाक करते। लोग हँसते। कोई काम करता नहीं था। वहाँ भी वही लगे रहते थे। आदमी कितनी मेहनत करेगा। वे अफसर बन कर पछताए। अच्छा मेहनत तो कर भी लेते मगर उनको ये कतई पसंद नहीं था कि कल तक के उनके साथी उनका मज़ाक बनाएँ, हास-परिहास करें। आखिर वो अफसर क्यूँ बने, इज्ज़त कमाने को, दबदबे के लिए। यहाँ देख रहे थे कि उनका दबदबा तो भाड़-चूल्हे गया लोग दायें-बाएँ, ऊपर-नीचे उनको ही दबा रहे हैं।

 

 

पुनश्च: मैंने सुना एक दिन तंग आकर उन्होने अपने रिवर्जन का प्रार्थना पत्र लगा दिया और मूषक मूषक पुनः की तर्ज़ पर पुन: निरीक्षक बन गए। और पूरी अफसरशाही को कोसते/गाली देते न थकते थे। वो कहते "सब बस नाम का है... सब खोखला है...सब ढकोसला है"

Sunday, June 29, 2025

व्यंग्य: छुओ न ! छुओ न ! मुझे छुआ तो 35 टुकड़े कर दूँगी

                      

 

             अब ये तो कोई बात नहीं हुई। इंसान शादी क्यों करता है ? यह कोई प्लेटोनिक रिश्ता बनाने को तो नहीं। प्लेटोनिक-व्लेटोनिक शादी से पहले की बातें होतीं हैं। अब शादी के पहले दिन ही या बोलो, पहली रात ही अगर दुल्हन दीदी कह दें खबरदार जो मुझे छुआ भी।  इतना सुन कर ही दूल्हे राजा को कैसा तो भी लगा होगा। यह तो कुछ नहीं आप तो ये सोचो तब कैसा लगा होगा जब दुल्हन दीदी ने अपने तकिये के नीचे से चाकू निकाल कर, चाकू दूल्हे राजा के मुंह पर लहरा कर धमकी भरे स्वर में कहा “35 टुकड़े कर दूँगी अगर मुझे छुआ भी ”। दूल्हे राजा ने अभी तक सिर्फ गाना सुना था “इस दिल के टुकड़े हज़ार हुए....” ये 35 टुकड़े और वो भी दिल के नहीं, समूचे जिस्म के। नई बात थी। दूल्हे के मुंह पर एक रंग आ रहा होगा एक रंग जा रहा होगा। 

 

 

          जैसे तैसे वो रात तो कटी। कहावत है न ! क़त्ल की रात। ये क़त्ल की रात तो कट गयी। दिन तो गुजर गया। मगर शाम से ही फिर वही स्यापा। दुल्हन दीदी ने लगातार तीन रात यह कह कर दूल्हे राजा की सिट्टी पिट्टी गुम कर दी। चौथी सुबह दूल्हे राजा का सब्र जवाब दे गया और घर वालों को पूरी कहानी बता दी। घर वाले भी चकित रह गये। खासकर ये 35 टुकड़े वाली बात। वे दौड़े-दौड़े गए और पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखा दी। पुलिस ने लगे हाथों लड़की वालों को भी बुला भेजा।

 

             दुल्हन दीदी ने सबके सामने साफ-साफ कह दिया वह किसी की अमानत है। हमारे समाज में कहावत भी है अमानत में खयानत नहीं। शादी की चौथी रात थी जब दुल्हन दीदी घर की चार दीवारी लांघ कर ये जा वो जा।

 

          

     पराई हूँ पराई मेरी आरज़ू न कर

    न मिल सकूँगी तुझे मेरी जुस्तजू न कर

    

 

 पर सोचने वाली बात ये है कि दुल्हन दीदी ने ये बात शादी से पहले अपने माता-पिता को स्पष्ट क्यों नहीं कर दी थी ? क्यों बेचारे दूल्हे राजा और उसके परिवार की फजीहत कराई। अपने परिवार की भी कोई इज्ज़त अफजाई तो हुई नहीं इससे। दुल्हन दीदी के माता-पिता को भी चाहिए था कि भली-भांति बिटिया से पूछ लेते तब आगे बढ़ते। हुआ तो अब भी वही जो दुल्हन रचि राखा।

 

 

 

 

Wednesday, June 25, 2025















 

सुपारी दी शादी से एक दिन पहले की

 



बीवी ने सुपारी दी, दिन तय हुआ 

शादी से एक दिन पहले का 

बीवी ने पता नहीं  ? क्यूँ रखा व्रत ?

शादी से एक दिन पहले का   

बीवी ज़िद कर रही शिलांग चलो 

दिन चुना है शादी से एक दिन पहले का  

कभी सूटकेस, कभी ड्रम का नाप लेती है 

सूटकेस, ड्रम,, छुरी-चाकू ये है 

मेरा सामान-ए-सफर शादी से एक दिन पहले का 

अब देखो ? वो कहाँ ? कैसे ? मुझे मारती ?

उसके बॉय-फ्रेंड् ने ले ली है सुपारी मेरे नाम की 

और दिन तय हुआ शादी से एक दिन पहले का